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वात दोष असंतुलन से हैं परेशान, अपनाएं आयुर्वेद के ये पांच आसान तरीके

नई दिल्ली: आयुर्वेद के अनुसार शरीर में वात, पित्त और कफ — ये तीनों दोष संतुलन में हों तभी व्यक्ति शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से स्वस्थ रहता है। इन्हीं में से वात दोष को ऊर्जा और गति का आधार माना गया है, जो वायु और आकाश तत्व से जुड़ा होता है। जब वात असंतुलित होता है तो इसका असर सांस, रक्त संचार, हृदय गति, त्वचा, बालों और तंत्रिका तंत्र पर पड़ता है। आयुर्वेद में वात दोष को संतुलित करने के कई सरल उपाय बताए गए हैं।

सबसे पहला उपाय है स्नेहपान यानी तेल का सेवन। विशेष रूप से तिल का तेल वात को शांत करने में बेहद लाभकारी माना जाता है। इसकी तासीर गर्म होती है, जो शरीर में बढ़ी हुई वायु को संतुलित करती है। इसे भोजन में मिलाकर या सीमित मात्रा में नियमित रूप से लिया जा सकता है।

दूसरा उपाय है अभ्यंग यानी तेल से मालिश। वात दोष का संबंध रूखेपन से होता है, जिससे त्वचा और बाल शुष्क हो जाते हैं। रोजाना या सप्ताह में कुछ बार तेल से मालिश करने से शरीर को गहराई से पोषण मिलता है और तंत्रिका तंत्र भी सक्रिय रहता है। यदि पूरे शरीर पर संभव न हो, तो सिर, पैरों और कानों के पीछे तेल लगाना विशेष रूप से लाभकारी होता है।

तीसरा उपाय है स्वेदन, यानी शरीर में पसीना लाना। योग, व्यायाम या हल्की गर्म प्रक्रिया से जब शरीर से पसीना निकलता है, तो विषैले तत्व बाहर निकलते हैं और ऊर्जा का प्रवाह बेहतर होता है, जिससे वात संतुलन में रहता है।

चौथा उपाय है संतुलित आहार। वात दोष को शांत करने के लिए भोजन में मीठा, खट्टा और नमकीन रस शामिल करना जरूरी माना गया है। साथ ही भोजन हमेशा गर्म और ताजा खाना चाहिए ताकि पाचन मजबूत रहे।

पांचवां उपाय है वेष्टन या गर्म पट्टी बांधना। वात बढ़ने पर अक्सर जोड़ों और हड्डियों में दर्द होने लगता है। ऐसे में दर्द वाले हिस्से पर गर्म पट्टी लगाने से राहत मिलती है और वात का शमन होता है।

इन सरल आयुर्वेदिक उपायों को अपनाकर वात दोष को संतुलित किया जा सकता है और शरीर को स्वस्थ व ऊर्जावान रखा जा सकता है

Manoj Mishra

Editor in Chief

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