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क्या है निष्कलंक महादेव मंदिर का रहस्य? जहां पांडवों को मिली थी सभी पापों से मुक्ति

क्या है निष्कलंक महादेव मंदिर का रहस्य? जहां पांडवों को मिली थी सभी पापों से मुक्ति

निष्कलंक महादेव मंदिर को गुप्त तीर्थ के नाम से जाना जाता है. पूरे भारत में कुल 5 गुप्त तीर्थ बताए गए हैं. जिनमें से 3 प्रकट है और 2 गुप्त तीर्थ आजतक सामने नहीं आए हैं. तीन कुछ इस प्रकार है रुपेश्वर महादेव, श्री स्तंभेश्वर महादेव, निष्कलंक महादेव.

निष्कलंक महादेव है रहस्यमयी

गुजरात के भावनगर के पास समुद्र तट पर स्थित इस पवित्र स्थान को निष्कलंक महादेव कहा जाता है. निष्कलंक महादेव का मंदिर समुद्र के बीच में बना हुआ है. निष्कलंक महादेव मंदिर के शिवलिंग हजारों सालों से अद्भुत, अविश्वसनीय, अकल्पनीय रहस्यों के साक्षी रहे हैं. दिन के 24 घंटों में से करीब 14 घंटे ये शिवलिंग समुद्र की गहराइयों में समा जाते हैं. उसके बाद बाहर मंदिर की केवल ध्वज पताका रह जाती है. इस निष्कलंक मंदिर में 5 शिवलिंग स्थित है. मान्यताओं के अनुसार, 5000 साल से ये शिवलिंग यहीं स्थित हैं.

यहां मिली थी पांडवों को पाप से मुक्ति

इनका इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है. महाभारत की युद्ध समाप्ति के बाद पांडव बड़े दुखी हुए कि उन्हें अपने ही सगे-सम्बन्धियों की हत्या का पाप लगा है. श्रीकृष्ण के कहे अनुसार, वर्तमान गुजरात में स्थित कोलियाक तट पार पहुंचे और भगवान शिव का ध्यान करते हुए तपस्या करने लगे. भगवान भोलेनाथ उनकी तपस्या से खुश हुए और पांचो भाइयों को लिंग रूप में अलग-अलग दर्शन दिए. वहीं पांचों शिवलिंग अभी भी हैं. साथ ही हर शिवलिंग के साथ यहां नन्दी महाराज भी मौजूद है. माना जाता है कि निष्कलंक महादेव का ये मंदिर कभी समुद्र की लहरों में अंदर ही गुप्त रूप से विराजमान था और कई सदियों के बितने के बाद प्रकट हुआ. भाद्रपद महीने की अमावस्या पर यहां मेला लगता है जिसे भाद्रवी कहा जाता है. प्रत्येक अमावस्या के दिन इस मंदिर में भक्तों की विशेष भीड़ रहती है. लोगों की ऐसी मान्यता है कि यदि किसी प्रियजन की चिता कि राख शिवलिंग पर लगाकार जल में प्रवाहित कर दें तो उसको मोक्ष मिल जाता है. मंदिर में भगवान शिव को राख, दूध, दही और नारियल चढ़ाए जाते हैं. यह भाद्रवी मेला मंदिर कि पताका फहराने से शुरू होता है. फिर यही पताका मंदिर पर अगले एक साल तक फहराती है और यह भी एक आश्चर्य की बात है की साल भर एक ही पताका लगे रहने के बावजूद कभी भी इस पताका को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है.

Manoj Mishra

Editor in Chief

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