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स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का लाभ लेकर वेतन की मांग नहीं कर सकता कर्मचारी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि कोई सरकारी कर्मचारी एक ही घटना से लाभ भी नहीं ले सकता और उसी आधार पर उसे चुनौती भी नहीं दे सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिसने अनधिकृत अनुपस्थिति को बिना वेतन अवकाश (Leave Without Pay) के रूप में नियमित कराकर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (Voluntary Retirement) का लाभ प्राप्त कर लिया हो, वह बाद में उसी अवधि के वेतन से इनकार किए जाने को चुनौती नहीं दे सकता।

जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता का आचरण “Approbate and Reprobate” के सिद्धांत के विरुद्ध है। यानी कोई व्यक्ति एक ही लेन-देन से लाभ लेने के बाद अपने हित में उसी को चुनौती नहीं दे सकता।

क्या था मामला?

याचिकाकर्ता वर्ष 1989 में सिंचाई विभाग में नियुक्त हुआ था। वर्ष 2014 में विभागीय विलय के बाद उसका स्थानांतरण शिकोहाबाद कर दिया गया। स्वास्थ्य संबंधी समस्या का हवाला देते हुए उसने वैकल्पिक कार्य की मांग की। मांग पूरी नहीं होने पर उसने 20 वर्ष की सेवा पूरी होने और 45 वर्ष की आयु होने के आधार पर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का आवेदन दिया।

कार्यपालक अभियंता ने उसकी 1 फरवरी 2015 से 29 जनवरी 2016 तक की अनधिकृत अनुपस्थिति को बिना वेतन अवकाश के रूप में नियमित किया और अलग आदेश से उसे स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति भी प्रदान कर दी।

बाद में कर्मचारी ने यह कहते हुए वेतन की मांग की कि यदि विभाग को उसकी अनुपस्थिति अवैध लगती थी तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए थी, न कि वेतन रोका जाना चाहिए था। उसकी याचिका पहले यूपी राज्य लोक सेवा अधिकरण ने खारिज कर दी, जिसके बाद उसने हाईकोर्ट का रुख किया।

हाईकोर्ट का फैसला

हाईकोर्ट ने कहा कि कर्मचारी की अनधिकृत अनुपस्थिति को नियमित किए बिना उसे स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का लाभ मिल ही नहीं सकता था। यदि अनुपस्थिति नियमित नहीं होती तो उसकी सेवा में बाधा (break in service) मानी जाती और वह स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवश्यक अर्हता भी खो देता।

कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने नियमितीकरण का लाभ लेकर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति प्राप्त की, लेकिन बाद में उसी नियमितीकरण के आधार पर वेतन न मिलने को चुनौती दी, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं है।

हालांकि हाईकोर्ट ने माना कि यह याचिका न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग का मामला है और इस पर लागत (cost) लगाई जा सकती थी, लेकिन यह देखते हुए कि कर्मचारी वर्ष 2016 में ही सेवानिवृत्त हो चुका है, अदालत ने लागत नहीं लगाई और याचिका खारिज कर दी।

Manoj Mishra

Editor in Chief

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