रायबरेली : यदि आंखों में सपने और हौसले बुलंद हों तो इंसान क्या कुछ नहीं कर सकता. रायबरेली की ‘आयशा’ उन महिलाओं के लिये एक प्रेरणा स्त्रोत हैं, जो इच्छाशक्ति की कमी की वजह से जीवन में कुछ कर नहीं पाती. 12वीं पास किस्मतूं निशा उर्फ आयशा ने ग्रामीण महिलाओं को साथ लेकर स्वयं सहायता समूह बनाया. आज आयशा एक सामान्य घरेलू महिला से वर्किंग वुमन बनकर हर महीने में लाखों रुपये कमा रही हैं. शिवगढ़ ब्लॉक के ओसाह ग्राम की रहने वाली किस्मतूं निशा उर्फ आयशा ने बताया, स्वयं सहायता समूह (SHG) में जुड़ने से पहले घरेलू महिला थीं. घर में शौहर के साथ एक बेटी और तीन बेटों के साथ वह सामान्य जीवन जी रही थीं. राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) से जुड़ी महिलाओं ने 2020 में संपर्क किया. शुरू में मैंने सिलाई-कढ़ाई की. इसके बाद साल 2022 में मैंने खुद का आयशा स्वयं सहायता समूह बनाया. शुरुआत में 7 से 8 महिलाओं का समूह बनाया. आज लगभग 30 महिलाएं मेरे साथ हैं.
कबाड़ वालों को साथ जोड़ा :आयशा ने बताया, सिलाई के काम के साथ ही डिटर्जेंट पाउडर तैयार करने का काम भी शुरू किया. मार्केटिंग के लिए कबाड़ वालों को अपने साथ जोड़ा. कबाड़ का काम करने वालों को 100 रुपये प्रति दिन देती थी. रोजाना कम से कम 30 से 40 किलो डिटर्जेंट पाउडर सेल होता था. आज के समय में 70 रुपये प्रति किलो की दर से रोजाना 50 किलो डिटर्जेंट पाउडर सेल होता है. जिससे उन्हें 3500 रुपये प्रतिदिन की इनकम हो रही है.
बदल रही महिलाओं की जिंदगी :समूह से जुड़ने के बाद अन्य महिलाओं की जिंदगी में भी बड़ा बदलाव आया है. पहले जहां समय यूं ही निकल जाता था, अब उसी समय का सही उपयोग कर ये महिलाएं अपने परिवार का भरण-पोषण कर रही हैं. इसके अलावा, समूह के माध्यम से महिलाओं को लोन की सुविधा भी मिलती है, जिससे वे अन्य छोटे व्यवसाय भी शुरू कर सकें और कमाई होने पर प्रतिपूर्ति कर दें.
बराबर हिस्सों में बांटती हैं मुनाफा :आयशा कहती हैं,समूह के जरिए न केवल रोजगार मिल रहा है, बल्कि महिलाओं को आत्मविश्वास, सम्मान और एक नई पहचान भी प्रदान कर रहा है. इसमें जो भी मुनाफा होता है, उसे काम के हिसाब से बांटा जाता है. महिलाएं चाहती हैं कि सरकार उन्हें एक स्थायी बाजार उपलब्ध कराए, जिससे वे अपने उत्पाद स्थानीय लोगों तक आसानी से पहुंचा सकें, जो रोजगार को काफी बढ़ावा दे सकता है.
खड़ा किया ई-रिक्शा का व्यवसाय :आयशा ने बताया, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) कार्यक्रम के जरिये CIF फंड (Collective Investment Fund) की जानकारी मिली. उन्होंने लोन लेकर एक नया ई-रिक्शा खरीदा. जिसे किराए पर चलवाना शुरू किया. फिर समूह का CCL (Cash Credit Loan) भी कराया. उससे भी नया ई-रिक्शा खरीदने की बजाय सेकंड हैंड रिक्शे खरीदे. आयशा और उनकी समूह की महिलाओं के पास करीब 12 ई-रिक्शे हैं.
पति और सास का मिला सहयोग: आयशा ने बताया, एक ई-रिक्शा से रोजाना 300 रुपये मिल जाते हैं. जिससे रोजाना 3500 रुपये की राशि मिल रही है. महीने के हिसाब से करीब एक लाख रुपये से अधिक की कमाई हो जाती है. इसी तरह दो बोलेरो भी लिया. आयशा ने बताया, CCL और CIF लोन को जमा कर दिया है. मेरे शौहर शफीकुर्रहमान मस्जिद में हाफिज हैं. मेरे इस काम में शौहर के साथ सास का भी सहयोग रहा.
पर्दे में रहकर कर रहीं काम : शफीकुर्रहमान कहते हैं, मुझे अपनी बीवी के काम से कोई दिक्कत नहीं है. पर्दे में रहकर वे सब काम कर रही हैं. मैं मस्जिद में हाफिज का काम करता हूं. इस्लाम यह नहीं कहता कि बीवी घर से बाहर न निकले. पर्दे का मतलब यह कतई नहीं होता है कि यह सिर्फ चेहरे का ही पर्दा हो. बीवी के काम करने से हमारा काम अच्छा हो गया है. अभी हमें सिलाई मशीनें भी मिली हैं. सरकार की तरफ से हमें ई-रिक्शा भी मिला. अगर मुस्लिम समाज के लोग परदे का ध्यान रखकर काम करते हैं तब भी महिलाओं को काम करने में कोई दिक्कत नहीं होती.
पति और सास का मिला सहयोग: आयशा ने बताया, एक ई-रिक्शा से रोजाना 300 रुपये मिल जाते हैं. जिससे रोजाना 3500 रुपये की राशि मिल रही है. महीने के हिसाब से करीब एक लाख रुपये से अधिक की कमाई हो जाती है. इसी तरह दो बोलेरो भी लिया. आयशा ने बताया, CCL और CIF लोन को जमा कर दिया है. मेरे शौहर शफीकुर्रहमान मस्जिद में हाफिज हैं. मेरे इस काम में शौहर के साथ सास का भी सहयोग रहा.
पर्दे में रहकर कर रहीं काम : शफीकुर्रहमान कहते हैं, मुझे अपनी बीवी के काम से कोई दिक्कत नहीं है. पर्दे में रहकर वे सब काम कर रही हैं. मैं मस्जिद में हाफिज का काम करता हूं. इस्लाम यह नहीं कहता कि बीवी घर से बाहर न निकले. पर्दे का मतलब यह कतई नहीं होता है कि यह सिर्फ चेहरे का ही पर्दा हो. बीवी के काम करने से हमारा काम अच्छा हो गया है. अभी हमें सिलाई मशीनें भी मिली हैं. सरकार की तरफ से हमें ई-रिक्शा भी मिला. अगर मुस्लिम समाज के लोग परदे का ध्यान रखकर काम करते हैं तब भी महिलाओं को काम करने में कोई दिक्कत नहीं होती.
आयशा मुस्लिम समाज के लिए आइडल : उपायुक्त सविता सिंह ने बताया, पापड़, चिप्स, ब्यूटी पार्लर, कपड़े की सिलाई-कढ़ाई का काम भी हो रहा है. शिवगढ़ की आयशा मुस्लिम समाज से आती हैं. वह मुस्लिम समाज के साथ-साथ अन्य समाज के लिये भी आइडल हैं. 2020 में समूह से वह जुड़ीं, उसके बाद उनकी लगन ही थी जिसके कारण आज 8 से 10 समूह तैयार किया. उनके साथ जुड़ी महिलाएं भी अच्छा काम कर रही हैं. आयशा के समूह की महिलाओं ने अपने प्रोडक्ट को बेचने के लिये कबाड़ियों की एक सेल चेन तैयार की जोकि उनके उत्पाद को बेचने में मददगार हो रही है.
प्रेरणा सखी सहेली होगा प्रोडक्ट का नाम: NRLM की उपायुक्त सविता सिंह ने बताया, आयशा के समूह से जुड़ी महिलाओं ने डिटर्जेंट पाउडर प्रोडक्ट को सेल करने के लिए विश्वास नाम का इस्तेमाल किया. लेकिन अब विभाग जिले में संचालित सभी स्वयं सहायता समूह में बनाए जा रहे उत्पादों को अब एक नाम देने जा रहा है. सभी उत्पाद के नाम प्रेरणा सखी सहेली होगा, जिस पर ग्रामीण आजीविका मिशन का लोगो भी लगा रहेगा.
5% राशि प्रमोट में होता है खर्च : रायबरेली जनपद का प्रेरणा सखी सहेली एक ब्रांड नेम कहलाएगा. उन्होंने यह भी बताया कि आयशा के समूह की महिलाओं द्वारा बेचे गए प्रोडक्ट की लागत निकाल करके 5% राशि उत्पाद को प्रमोट करने के लिए रखा जाता था. उसके लाभ को सभी समूह की महिलाएं आपस में बांट लेती हैं.
महिलाओं के साथ मिलकर कराया लोन: उन्होंने बताया कि 12वीं पास आयशा ने ऑटो खरीदने का सुझाव दिया था, जिसके बाद उन्होंने समूह की 6 महिलाओं को साथ में जोड़कर लोन करवाया. जिसमें उन्हें 6 लाख रुपए का लोन मिला. आयशा और समूह की सभी महिलाओं ने अपनी बचत जमा भी इन ऑटो को खरीदने में खर्च की. समूह में मिले लोन को भी सभी ने मिलकर जमा कर दिया है.आयशा की आमदनी लाखों में: उपायुक्त सविता सिंह ने बताया, आज आयशा के पास खुद के 6 ऑटो हैं. समूह की अन्य 6 महिलाओं के पास अपने-अपने ऑटो हैं. इन ऑटो से मिलने वाले किराए से समूह की अन्य महिलाएं फायदा कमा रही हैं. आयशा के पास इस समय समूह की मदद से कपड़े की दुकान, डिटर्जेंट पाउडर का काम, 6 ऑटो, दो फोर व्हीलर हैं. जिसकी मदद से वह महीने में लगभग एक लाख रुपए तक की आमदनी कमा ले रही हैं.





