- दिल्ली-देहरादून आर्थिक गलियारे के एक हिस्से में बने अंडरपास का इस्तेमाल 18 वन्यजीव प्रजातियां कर रही हैं।
- हाथी, सांभर और चीतल जैसे जानवर अंडरपास के शांत हिस्सों का ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। जबकि, सुनहरे सियार और जंगली सूअर जैसे कुछ जानवर शोर वाले हिस्सों में भी दिखे।
- इसी इलाके में पहले हुए एक अध्ययन ने भी कहा था कि अंडरपास को असरदार बनाने के लिए मानवीय गतिविधि कम करना और लंबे समय तक निगरानी जरूरी है।
भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) ने दिल्ली और देहरादून के बीच बने नए एक्सप्रेस वे पर वन्यजीवों के लिए बनाए गए अंडरपास का अध्ययन किया और वन्यजीवों द्वारा इसके इस्तेमाल के दर्ज किए हैं। दिल्ली-देहरादून आर्थिक गलियारे के नाम से जाने जाने वाला करीब 200 किलोमीटर लंबा यह एक्सप्रेस वे 2025 से चालू है और पिछले महीने अप्रैल में इसका औपचारिक उद्घाटन हुआ।
शोधकर्ताओं ने इसके 20 किलोमीटर लंबे हिस्से का अध्ययन किया। यह तराई क्षेत्र का एक अहम जैव विविधता वाला इलाका है, जहां हाथी, बाघ, ग्रेट हॉर्नबिल और किंग कोबरा पाए जाते हैं। इस हिस्से के लगभग आधे भाग यानी 10.97 किलोमीटर में जानवरों के आने-जाने के लिए एलिवेटेड रोड और अंडरपास बनाए गए हैं। इनका मकसद सड़क पर जानवरों की मौत, मानव-वन्यजीव संघर्ष और वन्यजीव आबादी के अलग-थलग पड़ने के खतरे को कम करना है।
यह अध्ययन क्षेत्र बड़े राजाजी-शिवालिक लैंडस्कैप का हिस्सा है और इसमें राजाजी टाइगर रिजर्व, आसपास के वन क्षेत्र, दून घाटी, सड़कें, बस्तियां और हाथियों के आवाजाही मार्ग एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
अध्ययन के लिए इस इलाके को तीन हिस्सों में बांटा गया। इनमें नदी तल, पहाड़ी इलाका और साल वन वाला हिस्सा शामिल था। डेटा जुटाने के लिए कैमरा ट्रैप और आवाज रिकॉर्ड करने वाले उपकरण लगाए गए। पहले हिस्से में 16 मई से 24 जून 2025 के बीच 40 दिनों तक करीब 150 कैमरा ट्रैप लगाए गए। इसके अलावा तीनों हिस्सों में 29 ऑडियोमॉथ रिकॉर्डर लगाए गए, ताकि ट्रैफिक के शोर को समझा जा सके और यह देखा जा सके कि शोर का जानवरों के अंडरपास इस्तेमाल करने पर क्या असर पड़ता है।
इस्तेमाल के शुरुआती प्रमाण
कैमरा ट्रैप में इंसानों, पालतू जानवरों और वन्यजीवों की कुल 1,11,234 तस्वीरें दर्ज हुईं। इनमें से 40,444 तस्वीरों में 18 अलग-अलग वन्यजीव प्रजातियां अंडरपास का इस्तेमाल करती दिखीं। सबसे ज्यादा सुनहरे सियार दर्ज किए गए। इसके बाद नीलगाय, सांभर, भारतीय खरहा और चीतल दिखे। अध्ययन में हाथियों द्वारा अंडरपास इस्तेमाल करने के 60 मामले भी दर्ज किए गए।
कुछ जानवरों ने इन अंडरपास का इस्तेमाल जल्दी शुरू कर दिया। नीलगाय शुरुआती और ज्यादा दिखने वाली प्रजातियों में शामिल रही। हाथी, सुनहरे सियार, खरहा, सांभर और चीतल निगरानी शुरू होने के पहले पांच दिनों में ही दर्ज हो गए। तेंदुआ, रस्टी-स्पॉटेड कैट और ग्रे मंगूस (नेवला) बाद में दिखे।
फरवरी 2026 में जारी अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि वन्यजीवों ने अंडरपास के सभी हिस्सों का समान रूप से इस्तेमाल नहीं किया। हाथी और खुरदार जानवर अंडरपास के कुछ खास हिस्सों में ज्यादा दिखे। वे पूरे गलियारे में एक समान रूप से फैले हुए नहीं पाए गए।
शोर और मानवीय गतिविधि का असर
अध्ययन में पाया गया कि शोर इस बात को प्रभावित कर सकता है कि अलग-अलग जानवर अंडरपास का इस्तेमाल कैसे करते हैं। आवाज की रिकॉर्डिंग से शोधकर्ताओं ने पाया कि पूरे अध्ययन क्षेत्र में ट्रैफिक और इंसानी गतिविधियों की आवाज, जानवरों की आवाज से ज्यादा थी।
जब शोधकर्ताओं ने जानवरों की मौजूदगी की तुलना शोर से की, तो उन्होंने पाया कि सांभर, चीतल और एशियाई हाथी अंडरपास के शांत हिस्सों का ज्यादा इस्तेमाल कर रहे थे। इसके उलट, सुनहरे सियार, नीलगाय और जंगली सूअर शोर वाले हिस्सों में ज्यादा दर्ज किए गए।
अध्ययन में यह भी देखा गया कि जानवर किस समय अंडरपास के नीचे सक्रिय थे और उनकी गतिविधि इंसानों, मवेशियों और वाहनों की गतिविधियों से कितनी मिलती थी। तेंदुए ने इंसानों, मवेशियों और वाहनों से दूरी बनाए रखी। हाथियों में भी ऐसा ही रुझान दिखा। हाथी ज्यादातर सुबह, शाम और रात में दर्ज हुए, जब मानवीय गतिविधि कम थी। सुनहरे सियार इंसानी गतिविधियों के समय भी सक्रिय दिखे।
अध्ययन के लेखकों का कहना है कि जिन जगहों से जानवर ज्यादा गुजरते हैं, वहां शोर कम करने के उपाय, जैसे साउंड बैरियर, संवेदनशील प्रजातियों के लिए इन अंडरपास को और बेहतर बना सकते हैं।
डब्ल्यूआईआई की 2026 की यह रिपोर्ट दिखाती है कि दिल्ली-देहरादून गलियारे पर बने हाइवे क्रॉसिंग ढांचों का इस्तेमाल हाथियों सहित कई वन्यजीव कर रहे हैं।
मोंगाबे-हिन्दी से बातचीत में वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया की शोधकर्ता उपासना गांगुली, जो कि इस रिपोर्ट का हिस्सा नहीं है, ने बताया “वन्यजीवों द्वारा इस्तेमाल के शुरुआती प्रमाण उत्साहजनक हैं, लेकिन इसे लंबे समय की सफलता का प्रमाण मानने के बजाय एक शुरुआत के रूप में देखना चाहिए। असली बात यह है कि क्या अलग-अलग मौसमों में, लंबे समय तक, कई प्रजातियां और खासकर हाथियों के झुंड इनका लगातार इस्तेमाल कर रहे हैं।”
राजाजी क्षेत्र में पहले भी ऐसे नतीजे मिले
यह रिपोर्ट इस इलाके में वन्यजीवों द्वारा हाइवे क्रॉसिंग के इस्तेमाल को दर्ज करने वाला पहला अध्ययन नहीं है। साल 2022 में डब्ल्यूआईआई और उत्तराखंड वन विभाग ने एक जारी की थी। इसमें मोतीचूर में स्थित कांसरो-बारकोट कॉरिडोर में पड़ने वाले चिल्ला-मोतीचूर कॉरिडोर और ‘तीन पानी’ में बने नए अंडरपासों का अध्ययन किया गया था। ये अंडरपास राजाजी लैंडस्कैप में राष्ट्रीय राजमार्ग 72 पर हैं, लेकिन ये नए दिल्ली-देहरादून अध्ययन के गणेशपुर-असरौरी हिस्से से अलग हैं।
मोतीचूर और तीन पानी राजाजी लैंडस्कैप के अहम क्रॉसिंग स्थल हैं। यहां सड़कें और दूसरे ढांचे वन क्षेत्रों के बीच जानवरों की आवाजाही के रास्तों से मिलते हैं। ये अंडरपास इसलिए बनाए गए थे कि वाहन ऊपर फ्लाईओवर से गुजरें और जानवरों को इसे पार करने के लिए नीचे से जगह बनी रहे।
साल 2022 की रिपोर्ट में 94 दिनों में आठ स्तनधारी वन्यजीवों की 1,468 तस्वीरें दर्ज हुईं। इनमें हाथी, तेंदुआ, सांभर, नीलगाय, चीतल और जंगली सूअर शामिल थे। इसी दौरान इंसानों के 32,194 रिकॉर्ड, मवेशियों की 2,429 तस्वीरें और आवारा कुत्तों की 113 तस्वीरें भी दर्ज हुईं। रिपोर्ट में कहा गया कि लगातार मानवीय मौजूदगी से वन्यजीवों द्वारा इन गलियारों का इस्तेमाल सीमित हो रहा था।
इस रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि वन्यजीवों ने अंडरपास के सभी हिस्सों का समान रूप से इस्तेमाल नहीं किया। जिन जगहों पर पगडंडियां थीं, वहां जानवरों की आवाजाही ज्यादा थी। रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि मोतीचूर रेंज ऑफिस परिसर के पास वाले हिस्सों में वन्यजीवों की तस्वीरें कम दर्ज हुईं। इससे संकेत मिलता है कि अंडरपास के आसपास मानवीय गतिविधि और ढांचे जानवरों की आवाजाही को प्रभावित कर सकते हैं।
रिपोर्ट ने सुझाव दिया था कि फ्लाईओवर के नीचे मानवीय गतिविधि सीमित की जाए, पूरा ट्रैफिक फ्लाईओवर पर मोड़ा जाए, प्राकृतिक वनस्पति को फिर से बढ़ने दिया जाए और लंबे समय तक निगरानी की जाए।
हाथियों के मामले में 2022 की रिपोर्ट में पाया गया कि मोतीचूर में अकेले नर हाथी और बच्चों के साथ मादा हाथियों के झुंड, दोनों दर्ज हुए। तीन पानी में सिर्फ अकेले नर हाथी दर्ज किए गए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि हाथियों की कुल तस्वीरें मोतीचूर में ज्यादा थीं, लेकिन हाथियों की कैप्चर रेट तीन पानी में ज्यादा थी।
अदालत ने भी जताई थी चिंता
ये निष्कर्ष शिवालिक हाथी लैंडस्कैप में ढांचागत परियोजनाओं से जुड़े विखंडन की चिंता से भी जुड़े हैं। जनवरी 2021 में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर दिए में कहा था कि शिवालिक एलिफेंट रिजर्व जंगली हाथियों का अहम आवास है। ये हाथी बड़े इलाकों में आवाजाही करते हैं और उनके लिए बड़े, जुड़े हुए आवास जरूरी हैं।
अदालत ने शिवालिक एलिफेंट रिजर्व को डी-नोटिफाई करने वाली राज्य सरकार की अधिसूचना पर रोक लगा दी थी। अदालत ने कहा था कि इससे पर्यावरण और हाथियों की आबादी को अपूरणीय नुकसान हो सकता है।
इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करने वाले वकील अभिजय नेगी ने कहा कि डब्ल्यूआईआई के मौजूदा निष्कर्षों को सावधानी से देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इन उपायों ने क्रॉसिंग से जुड़ी समस्याओं को हल कर दिया है, लेकिन प्रकृति में माहौल के हिसाब से ढलने की क्षमता होता है।”
अंडरपास के बारे में नेगी ने कहा कि ये ज्ञात आवाजाही मार्गों से मेल खाते हैं, लेकिन हाथियों के सभी रास्ते ऐसी संरचनाओं से दर्ज नहीं हो सकते।
नेगी ने व्यापक योजना प्रक्रिया की भी आलोचना की। उन्होंने कहा, “योजना और वास्तविक कॉरिडोर उपयोग के बीच बहुत बड़ा अंतर है। अध्ययन इस बड़ी इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजना को लागू करने के मुख्य उद्देश्य से किए गए थे, जिसके राजनीतिक मायने भी हैं।”
बैनर तस्वीर: दिल्ली-देहरादून आर्थिक गलियारे के अंडरपास का इस्तेमाल करता एक तेंदुआ। अंडरपास अप्रैल में खुला, जबकि तेंदुआ, रस्टी-स्पॉटेड कैट और ग्रे मंगूस मई-जून 2025 में बाद में दिखे। तस्वीर: डब्ल्यूआईआई-एनएचएआई अध्ययन।





