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बेटियों ने किया ‘भरोसे का कत्ल’, हाईकोर्ट ने वापस छीन ली पिता से तोहफे में मिली जमीन

कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक 84 साल के बुजुर्ग पिता के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाते हुए उस ‘गिफ्ट डीड’ को रद्द कर दिया है, जिसके जरिए उन्होंने अपनी दो बेटियों को 2 एकड़ जमीन दान की थी। अदालत ने माना कि संपत्ति मिलने के बाद बेटियों ने अपने पिता को भोजन, आश्रय और बुनियादी जरूरतों के लिए बेसहारा छोड़ दिया। यह कानूनन ‘कंस्ट्रक्टिव फ्रॉड’ के दायरे में आता है। न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज की पीठ ने 2 फरवरी को दिए अपने आदेश में स्पष्ट किया कि बुजुर्गों द्वारा बच्चों को दी गई संपत्ति केवल कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि एक ‘भरोसा’ है। इसका उल्लंघन होने पर कानून मूकदर्शक नहीं रह सकता।

तुमकुरु तालुक के निवासी वेंकटैया ने 2023 में अपनी 2 एकड़ से अधिक जमीन अपनी दो बेटियों शिवम्मा (अब मृत) और पुट्टम्मा को इस उम्मीद और आश्वासन पर उपहार में दी थी कि वे उनके बुढ़ापे में उनकी देखभाल करेंगी। लेकिन संपत्ति नाम होते ही बेटियों ने पिता की उपेक्षा शुरू कर दी। वेंकटैया ने ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007’ की धारा 23 के तहत आवेदन किया, जिसे स्थानीय अधिकारियों (असिस्टेंट और डिप्टी कमिश्नर) ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि गिफ्ट डीड में “देखभाल करने” की कोई लिखित शर्त नहीं जुड़ी थी।

अदालत ने अधिकारियों के उस तकनीकी तर्क को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि लिखित शर्त के बिना संपत्ति वापस नहीं ली जा सकती। न्यायमूर्ति गोविंदराज ने कहा, “भारतीय समाज, विशेषकर ग्रामीण कर्नाटक में वरिष्ठ नागरिक कानूनी औपचारिकताओं के बजाय विश्वास, पारिवारिक आश्वासन और नैतिक अपेक्षाओं पर काम करते हैं। हर गिफ्ट डीड में ‘भरण-पोषण’ की लिखित शर्त अनिवार्य करना इस अधिनियम के सुरक्षात्मक उद्देश्य को विफल कर देगा।”

अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि चूंकि वेंकटैया अनपढ़ थे और दस्तावेज बेटियों द्वारा तैयार किए गए थे, इसलिए बेटियों द्वारा ‘देखभाल की शर्त’ को लिखित रूप में न डालना उनकी दुर्भावना को दर्शाता है।

अदालत ने अधिनियम की धारा 23(1) की व्याख्या करते हुए कहा कि यदि कोई वरिष्ठ नागरिक अपनी संपत्ति उपहार में देता है और प्राप्तकर्ता बुनियादी सुविधाएं प्रदान करने में विफल रहता है तो यह माना जाएगा कि हस्तांतरण ‘धोखाधड़ी या अनुचित प्रभाव’ के तहत किया गया था। ऐसी स्थिति में हस्तांतरण को शून्य घोषित करने का अधिकार पीड़ित को है।

नाती का दावा खारिज, पिता को मालिकाना हक

सुनवाई के दौरान एक बेटी (पुट्टम्मा) ने पिता की बात मान ली और अनापत्ति दे दी लेकिन मृतक बेटी के बेटे (नाती) नरसेगौड़ा ने याचिका का विरोध किया। अदालत ने फटकार लगाते हुए खारिज कर दिया और कहा, “बिना जिम्मेदारी निभाए केवल संपत्ति पर अधिकार जताना कानूनी लाभ का दुरुपयोग है। यह कानून बुजुर्गों को शोषण से बचाने के लिए बना है, न कि उत्तराधिकारियों के लालच को बढ़ावा देने के लिए।”

हाईकोर्ट ने राजस्व अधिकारियों को तत्काल निर्देश दिया है कि तुमकुरु की उक्त संपत्ति के सभी रिकॉर्ड्स में वेंकटैया का नाम ‘पूर्ण स्वामी’ के रूप में फिर से दर्ज किया जाए। इस फैसले ने उन हजारों बुजुर्गों के लिए उम्मीद की किरण जगाई है जो संपत्ति के लालच में अपनों के हाथों ही उपेक्षित और प्रताड़ित हो रहे हैं।

Manoj Mishra

Editor in Chief

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