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अगर आप कभी गिरते हैं, तो खुद को फिर से खड़ा करना सीखिए’…भव्या कृति BPSC के पहले प्रयास में बनीं DSP

अगर आप कभी गिरते हैं, तो खुद को फिर से खड़ा करना सीखिए. सफलता उन्हीं लोगों तक पहुंचती है जो हार मानने के बजाय दोबारा शुरुआत करने का साहस रखते हैं.” NDTV से  बात करते हुए यह कहना था पटना की रहने वाली भव्या कृति का, जिन्होंने 70वीं बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) परीक्षा में 117वीं रैंक हासिल कर डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस (DSP) पद के लिए चयनित हुई हैं. खास बात यह रही कि उन्होंने इंटरव्यू में 100 अंक हासिल किए, जो इस परीक्षा में सबसे अधिक रहे. उनका कुल स्कोर 564 अंक रहा.

 इंजीनियरिंग के बाद चुनी सिविल सेवा की राह

भव्या ने साल 2022 में चेन्नई से इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग (ECE) में बीटेक किया. उनका कहना है कि बचपन से ही उनका सपना सिविल सेवा में जाने का था. हालांकि, ग्रेजुएशन के दौरान की गई छह महीने की इंटर्नशिप ने इस सपने को एक मजबूत संकल्प में बदल दिया.

इंटर्नशिप के दौरान उन्हें महसूस हुआ कि सिविल सेवा ही उनका वास्तविक उद्देश्य है. इसके बाद उन्होंने तैयारी शुरू कर दी. साइंस की पृष्ठभूमि से आने के कारण इतिहास, भूगोल, कला एवं संस्कृति की पढ़ाई उनके लिए बिल्कुल नई थी. इसलिए उन्होंने सबसे पहले NCERT किताबों से अपनी बुनियाद मजबूत की.UPSC की दो असफलताओं ने सिखाया, BPSC में मिली सफलता

भव्या ने BPSC से पहले दो बार UPSC की परीक्षा दीं, लेकिन दोनों में सफलता नहीं मिली. हालांकि, वे इन असफलताओं को अपनी सबसे बड़ी सीख मानती हैं. उनका कहना है कि UPSC की तैयारी ने उन्हें विषयों को समझना सिखाया. आर्ट एंड कल्चर, भूगोल, पर्यावरण, आंतरिक सुरक्षा और कंटेम्परेरी विषयों पर बनी मजबूत पकड़ ने BPSC मेंस परीक्षा और इंटरव्यू में उन्हें बढ़त दिलाई.

वे बताती हैं कि UPSC की तैयारी ने केवल ज्ञान ही नहीं दिया, बल्कि उत्तर लिखने की शैली, विश्लेषणात्मक सोच और विभिन्न विषयों के बीच संबंध स्थापित करने की क्षमता भी विकसित की. यही मजबूत आधार आगे चलकर BPSC में उनकी सफलता की वजह बना.

‘कमजोर महसूस करना गलत नहीं, लेकिन वहीं रुक जाना गलत है’

भव्या मानती हैं कि सिविल सेवा की तैयारी जितनी अकादमिक परीक्षा है, उतनी ही मानसिक मजबूती की भी परीक्षा है. उन्होंने बताया कि तैयारी के दौरान कई बार ऐसा समय आया जब वे बेहद निराश महसूस करती थी. ऐसे समय में वे खुद से सवाल करती थीं कि आखिर उन्हें क्या परेशान कर रहा है. वे अपनी भावनाओं को दबाने के बजाय उन्हें समझने की कोशिश करती थी और आत्ममंथन करती थी.

वे कहती हैं कि यदि किसी दिन पढ़ाई नहीं हो पाती थी तो वे खुद को थोड़ा समय देती थी, लेकिन अगले ही दिन तय समय पर फिर से पढ़ाई की मेज पर बैठ जाती थी. उनका मानना है कि “कुछ करना, कुछ भी न करने से हमेशा बेहतर होता है.”

छोटे लक्ष्य, अखबार और लगातार अभ्यास

भव्या की तैयारी पूरी तरह अनुशासित थी. वे रोज, हर सप्ताह और हर महीने के लक्ष्य तय करती थी और उन्हें पूरा होने पर चिह्नित करती थी. इससे तैयारी व्यवस्थित बनी रही.

उन्होंने नियमित रूप से राष्ट्रीय और क्षेत्रीय संकलन के अखबार पढ़े. समसामयिक घटनाओं, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों, सरकारी रिपोर्टों, नीति आयोग, SDG और ASER जैसी रिपोर्टों के नोट्स तैयार किए, जिन्हें उन्होंने मेंस के उत्तरों और इंटरव्यू में प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया.

प्रिलिम्स परीक्षा के लिए उन्होंने लगातार मॉक टेस्ट दिए और OMR शीट भरने का भी अभ्यास किया. वहीं मेंस परीक्षा में उत्तर लेखन, प्रस्तुतीकरण, नक्शे, फ्लोचार्ट और डायग्राम पर विशेष ध्यान दिया. इंटरव्यू की तैयारी के दौरान उन्होंने बजट, आर्थिक सर्वेक्षण, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय घटनाओं और बिहार से जुड़े समसामयिक मुद्दों पर विशेष फोकस रखा.

परिवार ने हर मुश्किल में दिया साथ

भव्या के पिता कंट्रोलर ऑफ डिफेंस अकाउंट्स (CDA) में कार्यरत हैं, जबकि उनकी मां गृहिणी हैं. वे बताती हैं कि बचपन से उन्होंने अपने पिता को सार्वजनिक सेवा करते देखा, जिसने उनके व्यक्तित्व और सोच को प्रभावित किया.

वहीं, उनकी मां हर कठिन समय में उनका सबसे बड़ा सहारा बनीं. जब भी वे निराश होती थीं, उनकी मां उन्हें यही विश्वास दिलाती थीं कि वे जरूर सफल होंगी.

भव्या का कहना है कि तैयारी के दौरान ऐसे लोगों का साथ होना बहुत जरूरी है जो आप पर विश्वास करें और कठिन समय में आपका आत्मविश्वास लौटाने का काम करें.परिणाम का वह दिन, जिसे परिवार कभी नहीं भूल पाएगा

भव्या आज भी रिजल्ट वाले दिन को याद कर भावुक हो जाती हैं. उन्होंने बताया कि परिणाम आने तक पूरे दिन बेचैनी और तनाव बना रहा. जैसे ही अंतिम सूची में अपना नाम देखा, वे खुशी से चिल्ला उठीं. उनकी मां दूसरे कमरे से दौड़कर आईं और दोनों एक-दूसरे से गले लगकर रोने लगीं.
कुछ देर बाद उनके पिता बाजार से लौटे. जैसे ही उन्हें बेटी के चयन की खबर मिली, उनकी आंखों में भी आंसू आ गए.

भव्या कहती हैं कि यह पहली बार था जब उन्होंने अपने पिता को रोते हुए देखा. उनके लिए वह पल केवल एक परीक्षा में सफलता का नहीं, बल्कि पूरे परिवार के सालों के धैर्य, भरोसे और संघर्ष की जीत का था. उनकी बहन भी उस खुशी में शामिल थीं.DSP के रूप में साइबर अपराध और जनविश्वास पर रहेगा फोकस

भव्या का मानना है कि पुलिस सेवा में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी समाज के लिए सकारात्मक बदलाव है. उनके अनुसार महिला अधिकारी होने से महिलाएं अपनी समस्याएं अधिक सहजता से पुलिस तक पहुंचा पाती हैं और न्याय पाने का भरोसा महसूस करती हैं.

DSP के रूप में वे ईमानदारी, संवेदनशीलता और जनविश्वास के साथ काम करना चाहती हैं. इंजीनियरिंग की पृष्ठभूमि होने के कारण उनकी विशेष रुचि साइबर अपराध, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित अपराधों और डीपफेक जैसे उभरते अपराधों से निपटने में है. अवसर मिलने पर वे साइबर क्राइम या विशेष अपराध शाखा में काम करना चाहेंगी.

एस्पिरेंट के लिए संदेश

भव्या का कहना है कि सिविल सेवा की तैयारी का सफर लंबा और चुनौतीपूर्ण जरूर है, लेकिन असंभव नहीं. वे एस्पिरेंट से कहती हैं कि असफलता, अनिश्चितता और निराशा इस यात्रा का हिस्सा हैं. ऐसे समय में सबसे जरूरी है खुद पर विश्वास बनाए रखना, मेहनत करते रहना और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ना.

 

Manoj Mishra

Editor in Chief

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