हंदवाड़ा। तीन दशक पहले हालात के कारण अपना घर छोड़ने को मजबूर हुआ एक विस्थापित कश्मीरी हिंदू परिवार अब फिर अपनी मिट्टी में लौट आया है। कुपवाड़ा जिले के लंगेट (हंदवाड़ा) में चंद्रा धर के परिवार ने न केवल अपने पुश्तैनी घर की ओर वापसी की है, बल्कि यहां ‘टेस्ट एंड ट्रीट्स’ नाम से एक रेस्तरां खोलकर नई शुरुआत भी की हैस्थानीय लोगों ने परिवार का गर्मजोशी से स्वागत किया, जिससे यह वापसी केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि भरोसे और सौहार्द की नई कहानी बन गई। चंद्रा धर कहती हैं कि लंगेट की गलियों में उनका बचपन बीता है और यहीं की यादें उन्हें हमेशा अपनी ओर खींचती रहीं। उन्होंने कहा, “मैंने जिंदगी के सबसे खूबसूरत दिन यहीं बिताए हैं। इतने वर्षों बाद लौटना ऐसा लग रहा है जैसे बचपन की यादें फिर से जीवित हो गई हों।”उन्होंने कश्मीर को पंडितों के लिए असुरक्षित मानने वाली धारणा से भी असहमति जताई। उनका कहना है कि जब भी वह घाटी आईं, स्थानीय मुस्लिम समुदाय ने उन्हें हमेशा सम्मान और अपनापन दिया। उन्होंने कहा कि मुझे यहां कभी पराया महसूस नहीं हुआ। लोगों ने हर बार मेरा साथ दिया और ऐसा एहसास कराया कि मैं अपने ही घर में हूं।
वापसी के पीछे एक भावनात्मक और व्यावहारिक कारण
धर परिवार की वापसी के पीछे एक भावनात्मक और व्यावहारिक कारण भी है। चंद्रा धर ने बताया कि उनके दोनों बेटे दिव्यांग हैं। डॉक्टरों ने उन्हें अत्यधिक गर्म मौसम से बचने की सलाह दी थी। ऐसे में परिवार ने अपने पैतृक शहर लौटने का फैसला किया, जहां मौसम भी अनुकूल है और अपने लोगों का साथ भी मिलता है।
चंद्र धर के बेटे आकाश धर ने कहा कि नया रेस्तरां केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि उम्मीद और एकजुटता का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि रेस्तरां शुरू करने में स्थानीय लोगों ने हर संभव सहयोग दिया। यहां फास्ट फूड, जूस और शेक उपलब्ध होंगे और गुणवत्ता को प्राथमिकता दी जाएगी।
कब हुई वापसी?
धर परिवार की यह वापसी ऐसे समय में हुई है, जब विस्थापित कश्मीरी पंडितों के सम्मानजनक पुनर्वास और घाटी में उनकी वापसी को लेकर चर्चा फिर तेज हुई है। हाल ही में श्रीनगर में आयोजित एक सम्मेलन में विभिन्न कश्मीरी हिंदू संगठनों ने न्याय, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और सम्मानजनक पुनर्वास की मांग उठाई थी। साथ ही पुनर्वास प्रक्रिया को गति देने के लिए शीर्ष समिति को फिर से सक्रिय करने की मांग भी की जा रही है।
लंगेट के लोगों के लिए धर परिवार की घर वापसी महज एक परिवार की वापसी नहीं है। उनके मुताबिक यह संदेश है कि वर्षों की दूरी के बावजूद इंसानी रिश्ते, भरोसा और साझा संस्कृति आज भी जिंदा हैं और कश्मीर की पहचान को मजबूती देते हैं।





