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बम-बंदूक के बिना भी ताइवान को घुटने पर ला सकता है चीन, जानें क्या है ड्रैगन की रणनीति

चीन और ताइवान की दुश्मनी आज की नहीं है। वर्षों से दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ लड़ रहे हैं। अपनी विस्तारवादी नीतियों के बल पर चीन इस छोटे से देश पर कब्जा करने की कोशिश करता रहता है। हाल के कुछ वर्षों में यह अक्सर देखा गया है कि स्ट्रेट ऑफ ताइवान को पार करते हजारों चीनी सैनिक, आसमान से बरसती मिसाइलें और भारी गोलाबारी के बीच तटीय इलाकों पर कब्जा करने की कोशिश की जाती है। हालांकि, अब ड्रैगन ने अपनी रणनीति बदल ली है।रक्षा और सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि चीन अब एक बिल्कुल अलग रणनीति पर काम कर रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के सबसे बड़े जल-थल हमले को अंजाम देने के बजाय, चीन ताइवान को आर्थिक और मनोवैज्ञानिक रूप से पूरी तरह अलग-थलग करने की रणनीति अपना सकता है।

इस नई रणनीति का उद्देश्य तुरंत ताइवान के क्षेत्र पर कब्जा करना नहीं, बल्कि ताइपे को यह विश्वास दिलाना है कि चीन का विरोध करना उसकी अर्थव्यवस्था और अस्तित्व के लिए बहुत महंगा साबित होगा। सैन्य विशेषज्ञ इसे ग्रे जोन रणनीति कहते हैं, जो पूर्ण पैमाने पर युद्ध के दायरे से नीचे रहकर लगातार दबाव बढ़ाने का काम करती है। इसमें नौसैनिक शक्ति, साइबर युद्ध, सूचना संचालन, आर्थिक दबाव और कानूनी दांव-पेंच शामिल हैं।

बूट्स और बम के मुकाबले नाकेबंदी क्यों आसान?

स्ट्रेट ऑफ ताइवान के पार पूर्ण पैमाने पर सैन्य आक्रमण करना दुनिया के सबसे जटिल सैन्य अभियानों में से एक है। इसके लिए चीनी योजनाकारों को हवाई नियंत्रण स्थापित करनी होगी। ताइवान के हवाई अड्डों को नष्ट करना होगा। 130 किलोमीटर खुले पानी में हजारों जहाजों की रक्षा करनी होगी। दुश्मन की गोलाबारी के बीच भारी मात्रा में सैनिकों और हथियारों की आपूर्ति बनाए रखनी होगी।

इसके विपरीत एक समुद्री नाकेबंदी बीजिंग को एक अलग और कम जोखिम भरा रास्ता दे देगी। चीनी नौसेना, कोस्ट गार्ड और वायु सेना ताइवान द्वीप को धीरे-धीरे घेरकर उसके बंदरगाहों और हवाई क्षेत्र तक पहुंच को पूरी तरह प्रतिबंधित कर सकते हैं। ताइवान पहुंचने से पहले ही व्यापारिक जहाजों को रास्ते में रोका जा सकता है। सुरक्षा चिंताओं के कारण कमर्शियल एयरलाइंस इस क्षेत्र से बचेंगी। बीमा प्रीमियम आसमान छूने लगेंगे और वैश्विक लॉजिस्टिक कंपनियां बिना एक भी मिसाइल दागे अपने जहाजों के रास्ते बदल देंगी।

इस नाकेबंदी का सीधा उद्देश्य ताइवान में ईंधन, औद्योगिक सामग्री और आवश्यक आयात की भारी किल्लत पैदा करना है। यह अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए भी एक बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि एक क्वारंटाइन या समुद्री निरीक्षण व्यवस्था के खिलाफ दूसरे देशों की सरकारों के लिए यह तय करना बेहद मुश्किल हो जाएगा कि सैन्य हस्तक्षेप कब और किस स्तर पर किया जाए।

बिना युद्ध के ताइवान को सुखाना

कई रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि चीन शुरुआत में अपने इन कदमों को नाकेबंदी का नाम देने से पूरी तरह बचेगा। इसके बजाय चीन ताइवान के आसपास कस्टम निरीक्षण या सुरक्षा क्वारंटाइन की घोषणा कर सकता है। नौसैनिक युद्धपोतों के बजाय चीनी कोस्ट गार्ड के जहाज व्यापारिक जहाजों पर सवार होकर जांच शुरू कर सकते हैं। चीनी अधिकारी दावा करेंगे कि वे केवल सीमा शुल्क नियमों को लागू कर रहे हैं या समुद्री सुरक्षा की रक्षा कर रहे हैं। लेकिन इसका व्यावहारिक प्रभाव ताइवान को धीरे-धीरे खत्म करने जैसा होगा। जहाजों की आवाजाही में देरी बढ़ेगी, ताइवान के बंदरगाहों के लिए शिपिंग कंपनियां बुकिंग बंद कर देंगी और कमर्शियल आत्मविश्वास पूरी तरह कमजोर हो जाएगा। इस कदम से चीन अमेरिका और उसके सहयोगियों के साथ सीधे सैन्य टकराव को टालते हुए दबाव को चरम पर पहुंचा सकेगा।

ताइवान के समुद्री मार्गों को बंद करना

ताइवान अपनी ऊर्जा, भोजन और औद्योगिक कच्चे माल की लगभग पूरी जरूरत समुद्री आयात के जरिए ही पूरा करता है। यही निर्भरता उसे चीन के लिए एक आसान निशाना बनाती है। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी, चीनी कोस्ट गार्ड और समुद्री मिलिशिया के सहयोग से ताइवान के प्रमुख बंदरगाहों के आसपास सैन्य अभ्यास या समुद्री सुरक्षा अभियानों के नाम पर अस्थायी अपवर्जन क्षेत्र घोषित कर सकती है। चीनी जहाज व्यापारिक जहाजों को डुबाने के बजाय उन्हें केवल रोकेंगे या उनके निरीक्षण में घंटों की देरी करेंगे, जो बाद में दिनों की देरी में बदल जाएगी। ऐसे में शिपिंग कंपनियों को भारी वित्तीय और सुरक्षा जोखिमों की गणना करनी होगी और ताइवान के बंदरगाह पूरी तरह ठप होने लगेंगे।

ऊर्जा आपूर्ति का गला घोंटना सबसे बड़ा हथियार

ताइवान की सबसे बड़ी कमजोरियों में से एक आयातित ऊर्जा पर उसकी अत्यधिक निर्भरता है। द्वीप अपनी लगभग सभी तेल, प्राकृतिक गैस और कोयले की जरूरतों का आयात करता है। इसमें भी एलएनजी सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह ताइवान की बिजली उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा संचालित करती है। यदि चीन की नाकेबंदी के कारण एलएनजी (LNG) टैंकरों का ताइवान पहुंचना बंद हो जाता है तो देश के भीतर ईंधन का भंडार तेजी से घटने लगेगा, जिससे पूरी बिजली व्यवस्था और उद्योग ठप होने की कगार पर पहुंच जाएंगे।

 

 

 

Manoj Mishra

Editor in Chief

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