बरेली। याद जब आती है उनकी ऐ सरन, जाता हूं बेखबर दुनिया से… शहर के प्रख्यात साहित्यकार बाबू रामजी शरण सक्सेना की ये पंक्तियां प्रेम के अलग-अलग रूप को दर्शाती है। उनका जन्म 20 मई 1907 को बदायूं में हुआ, 1930 के दशक में उन्होंने बरेली को अपनी कर्मभूमि बनाया। महान कवि डा. हरिवंश राय बच्चन उनके घनिष्ठ मित्रों में शामिल रहे। बच्चन और उनकी जीवनसंगिनी तेजी बच्चन का प्रेम बाबूजी के साहित्यिक परिवेश में परवान चढ़ाउनकी पंचभुजाकार कोठी ‘नीलकमल’ केवल एक भवन नहीं, बल्कि साहित्यिक और सांस्कृतिक स्मृतियों का जीवंत केंद्र थी। इसी परिसर में महानायक अमिताभ बच्चन और उनके भाई अजिताभ बच्चन ने अपने बचपन के कुछ यादगार पल भी बिताए। बरेली जंक्शन मार्ग पर स्थित ‘रामजी शरण सक्सेना एडवोकेट मार्ग’ उनकी न्यायप्रियता, साहित्यिक चेतना और मानवीय संवेदनाओं की अमिट याद दिलाता है।साहित्यकार बाबू रामजी के प्रपौत्र मनोज सक्सेना बताते हैं कि वर्ष 1952 में बाबूजी ने अपनी पत्नी के नाम पर ‘कमला कालोनी’ बसाई जो आगे चलकर साहित्यकारों और रचनाकारों का प्रमुख केंद्र बन गई। शाम ढलते ही उनकी कोठी पर साहित्यिक महफिलें सजती थीं, जिनमें गोपालदास नीरज, वसीम बरेलवी, कृष्ण बिहारी, डा. हरिवंश राय, निरंकार देव सेवक जैसे दिग्गज शामिल होते थे।वैश्विक ख्याति प्राप्त लेखक, विद्वान और मूर्तिकार हरीश जौहरी भी उनके घनिष्ठ मित्रों में थे। उन्होंने बाबूजी के निवास पर रहकर एक सुंदर स्त्री-प्रतिमा का निर्माण किया था, जो आज भी उस ऐतिहासिक भवन में सुरक्षित है। हिंदी साहित्य की अमर कवयित्री महादेवी वर्मा ने उनकी काव्य प्रतिभा की मुक्तकंठ से सराहना की थी।
कानून के भी अप्रितम ज्ञाता थे बाबूजी
बाबूजी फौजदारी कानून के अप्रतिम ज्ञाता थे, बरेली बार एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रहे। वर्ष 1953 का एक ऐतिहासिक प्रसंग आज भी कचहरी के गलियारों में आदर के साथ याद किया जाता है।
एक न्यायाधीश द्वारा एक पिता को पुत्र की हत्या के मामले में फांसी की सजा सुनाई गई थी। उस समय भी बाबूजी विचलित नहीं हुए। उन्होंने पूरे आत्मविश्वास से कहा था कि उच्च न्यायालय से उनका मुवक्किल निर्दोष सिद्ध होगा और अंत में ऐसा ही हुआ।
अमूल्य साहित्यिक धरोहर
बाबूजी की कृति ‘निर्झरणी’ पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय रही। उनके निधन (31 अगस्त 1984) के बाद उनकी पत्नी कमला देवी के प्रयासों से उनका उपन्यास ‘पाप और पुण्य’ प्रकाशित हुआ, जिसे महान कथाकार अमृतलाल नागर ने भी सराहा था।
बाबू रामजी की पारिवारिक और सांस्कृतिक विरासत आज भी उसी आत्मीयता के साथ जीवित है। उनके पुत्र दिवंगत जगदीश सरन सक्सेना ‘बच्चन बाबू’ के पुत्र अपने-अपने परिवारों सहित आज भी ऐतिहासिक निवास ‘नीलकमल’ में रहते हैं।





