छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग मुख्यालय अंबिकापुर में आज भी ऐसे कारीगर मौजूद हैं, जो पुरानी तकनीक को रोजगार का जरिया बनाए हुए हैं, तेजी से बदलते दौर में जहां मशीनों ने कई पारंपरिक हुनर को पीछे छोड़ दिया वही कुछ कारीगर आज भी अपनी कला और मेहनत के दम पर पुरानी विरासत को जिंदा रखें हुए हैं, अंबिकापुर के मुजमिल पिछले 25 सालों से केन फर्नीचर का काम कर रहे हैं. और अपने हाथों से बेहतरीन किस्म के वस्तुएं बनाकर बेच रहे हैं. और अपने बच्चों के लिए सरकारी नौकरी का सपना देखते हैं.कहते हैं कि इस काम में मेहनत ज्यादा है. और बच्चो को पढ़ाने में वे दिन रात पसीना बहाकर मेहनत कर रहे हैं कि बच्चे पढ़ लिख जाए और सफल हो जाए. कारीगर ने पिता का काम को अपनाया लेकिन वे नहीं चाहते है कि उनका काम को उनकी औलाद करें देखिये ये रिपोर्ट….करीब 25 सालों से बेत (Cane) फर्नीचर बनाने और बेचने का काम कर रहे हैं, अंग्रेज़ी में इसे “Cane” और हिंदी में “बेत” कहा जाता है. इस पारंपरिक काम में वे सोफा सेट, झूला, डाइनिंग सेट, पलंग, स्टूल और बच्चों के झूले जैसे कई तरह के फर्नीचर तैयार करते हैं…..हाथों की मेहनत, समय पर निर्भर काम
कारीगर ने बताया कि किसी भी फर्नीचर को बनाने में समय उसके डिजाइन और जटिलता पर निर्भर करता है, कुछ सामान एक-दो दिन में तैयार हो जाता है, जबकि जटिल डिजाइन वाले फर्नीचर को तैयार करने में एक हफ्ते तक का समय लग जाता है. खास बात यह है कि पूरा काम हाथ से किया जाता है, इसमें किसी मशीन का उपयोग नहीं होता.
पिता से सीखा हुनर, अब खुद संभाल रहे जिम्मेदारी
मुजमिल ने बताया कि उन्होंने यह कला अपने पिता से सीखी है, जो पहले से इस काम में जुड़े हुए थे, उन्होंने 12वीं तक पढ़ाई की, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते आगे की पढ़ाई नहीं कर सके और इसी काम को आगे बढ़ा रहे हैं, वे खुद पिछले 15 सालों से इस काम में सक्रिय हैं.
असम से आता है कच्चा माल, कई राज्यों तक पहुंच जानिए.
कारीगर ने बताया कि बेत (कच्चा माल) असम से आता है, जहां इसकी पैदावार होती है, हालांकि, वे इसे कोलकाता के व्यापारियों से खरीदते हैं, उनके बनाए फर्नीचर की मांग स्थानीय इलाकों जैसे वाड्रफनगर, उदयपुर, बलरामपुर और जशपुर में है,इसके अलावा वे जरूरत पड़ने पर झारखंड और उत्तर प्रदेश तक भी सामान भेज चुके हैं…
डिजाइन के हिसाब से तय होती है कीमत
कीमत की बात करें तो सोफा सेट लगभग ₹12,000 से ₹18,000 तक मिलता है, जबकि झूले ₹3,000 से शुरू होते हैं. फर्नीचर की कीमत उसके डिजाइन, मटेरियल और कारीगरी के आधार पर तय होती है.
मुजमिल ने बताया कि उनकी तीन बेटियां हैं और वे चाहते हैं कि उनकी बेटियां पढ़-लिखकर आगे बढ़ें और इस मेहनत भरे काम में न आएं, उनका सपना है कि कम से कम एक बच्चा नौकरी में जाए और बेहतर भविष्य बनाए…..
कमाई ठीक-ठाक लेकिन संघर्ष जारी
कारीगर ने कहा कि यह काम ठीक-ठाक आमदनी देता है, लेकिन केवल कारीगर के रूप में इसे चलाना काफी मुश्किल है. दुकान और व्यवसाय के रूप में यह किसी तरह चल रहा है, लेकिन चुनौतियां आज भी बनी हुई हैं.





