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संजय गुप्ता ने समय से पहले देख ली भारत की ग्रोथ, खड़ा कर दिया 52,000 करोड़ का बिजनेस

संजय गुप्ता की कहानी उस जिद्दी सोच की जीत की कहानी है, जिसने लोहे के टुकड़े को ब्रांड बना दिया. जब उन्होंने बाजार में कदम रखा, तो लोहे का मतलब सिर्फ वजन और भाव हुआ करता था. लेकिन संजय ने कुछ ऐसा देखा जो बड़े-बड़े दिग्गज नहीं देख पाए. उन्होंने समझ लिया था कि बदलते भारत की बुलंद इमारतों, मेट्रो के पिलरों और एयरपोर्ट की छतों को सिर्फ लोहा नहीं, बल्कि भरोसे की एक मजबूत नींव चाहिए. आज जब हम आधुनिक भारत के ढांचे को देखते हैं, तो उसमें छिपा हुआ स्टील भले ही नजर न आए, लेकिन उसकी नींव और पकड़ को बनाए रखने का काम स्टील ही करता है. बात हो रही है संजय गुप्ता की कंपनी एपीएल अपोलो (APL Apollo) की.

इस कंपनी का पूरा नाम है एपीएल अपोलो ट्यूब्स लिमिटेड (APL Apollo Tubes Limited). यह भारत की सबसे बड़ी स्ट्रक्चरल स्टील ट्यूब्स और पाइप्स बनाने वाली कंपनी है. यह मुख्य रूप से ERW (Electric Resistance Welded) स्टील ट्यूब्स, पाइप्स और हॉलो सेक्शन्स का उत्पादन करती है, जो कंस्ट्रक्शन, इंफ्रास्ट्रक्चर और इंडस्ट्री में इस्तेमाल होते हैं.

कंपनी की शुरुआत 1986 में सिकंदराबाद (गाजियाबाद) में एक यूनिट से हुई थी. अब इसके भारत में 11 स्टेट-ऑफ-द-आर्ट मैन्युफैक्चरिंग प्लांट हैं. इनमें से सिकंदराबाद, रायपुर, बेंगलुरु, हैदराबाद आदि के प्लांट्स तो काफी मशहूर हैं. UAE में भी एक प्लांट है. इसकी कुल प्रोडक्शन कैपेसिटी 5 मिलियन टन प्रति वर्ष (5 MTPA) है. दुनिया के सबसे बड़े क्रिकेट स्टेडियम नरेंद्र मोदी स्टेडियम (मोतेरा, अहमदाबाद), भारत मंडपम (नई दिल्ली), यशोभूमि (भारत इंटरनेशनल कन्वेंशन एंड एक्सपो सेंटर), केम्पेगौड़ा इंटरनेशनल एयरपोर्ट (बेंगलुरु)- टर्मिनल-2, नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट और तिरुपति रेलवे स्टेशन के डेवलपमेंट में APL Apollo के प्रोडक्ट्स इस्तेमाल हुए हैं. अब आप शायद अंदाजा लगा पा रहे होंगे कि यह कंपनी कितनी बड़ी है

कैसे आया स्टील ट्यूब और पाइप बनाने का आइडिया?

एपीएल अपोलो ने अब बेशक बड़े-बड़े आइकॉनिक प्रोजेक्ट्स पर काम किया है, लेकिन इसकी शुरुआत भी किसी भी आम कंपनी की तरह ही थी. बात 1980 के दशक की है, जब भारत एक बदलाव के मुहाने पर खड़ा था. संजय गुप्ता ने अपने पारिवारिक बिजनेस को करीब से देखा था, जो 1986 में शुरू हुआ था. उस समय स्टील ट्यूब्स और पाइप्स का बाजार बहुत बिखरा हुआ था. कोई भी दुकानदार या ठेकेदार यह नहीं पूछता था कि पाइप किस ब्रांड का है, बस यह देखा जाता था कि सबसे सस्ता कहां मिल रहा है. स्टील को एक कमोडिटी माना जाता था. यानी ऐसी चीज जिसकी कोई अपनी अलग पहचान नहीं होती. संजय के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि लोग उनके उत्पाद को सिर्फ लोहे के भाव न तौलें, बल्कि उसकी गुणवत्ता की कीमत समझें. जब उन्होंने पहली बार स्टील को ब्रांड बनाने की बात की, तो कुछ लोगों ने उनके आइडिया को सही नहीं बताया. उनके लिए स्टील सिर्फ स्टील था, लेकिन संजय के लिए यह भारत की तरक्की का ढांचा था.

सबकुछ लगा दिया था दांव पर

शुरुआती दिन संघर्ष भरे थे. संजय गुप्ता अक्सर फैक्ट्रियों के चक्कर काटते और इंजीनियरों से घंटों बातें करते. उन्हें समझ आया कि जो लोग देश के बड़े प्रोजेक्ट्स बना रहे हैं, उनके लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि ढांचा मौसम और वक्त की मार झेल पाएगा या नहीं. उन्होंने महसूस किया कि अगर वह क्वालिटी में शुद्धता और साइज में सटीकता दे सकें, तो लोग ज्यादा पैसा देने को भी तैयार होंगे. लेकिन यह सिर्फ कहने-भर से नहीं होने वाला था. इसके लिए उन्होंने अपनी पूरी जमापूंजी और तकनीक को दांव पर लगा दिया. उन्होंने पारंपरिक तरीकों को छोड़कर मॉडर्न टेक्नोलॉजी अपनाई, ताकि पाइप की फिनिशिंग और मजबूती में कोई कमी न रहे. यह एक बड़ा जुआ था, क्योंकि अगर बाजार ने ब्रांडेड स्टील को स्वीकार नहीं किया होता, तो कंपनी डूब सकती थी.

संजय गुप्ता की कहानी का असली टर्निंग पॉइंट तब आया जब उन्होंने स्ट्रक्चरल स्टील (Structural Steel) पर फोकस करना शुरू किया. उन्होंने देखा कि भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर का जो तूफान आने वाला है, उसमें भारी और पुराने ढंग के ढांचों की जगह हल्के लेकिन मजबूत स्टील ट्यूब्स लेंगे. उन्होंने आर्किटेक्ट्स और बिल्डर्स को यह समझाना शुरू किया कि कैसे उनके पाइप्स निर्माण की लागत कम कर सकते हैं और काम की रफ्तार बढ़ा सकते हैं. उन्होंने मार्केटिंग का सहारा लिया, विज्ञापन दिए और पहली बार टीवी पर स्टील के पाइप्स को चमकते हुए दिखाया गया. यह भारत के मध्यम वर्गीय परिवार और बड़े कॉर्पोरेट्स के लिए एक नया अनुभव था. लोग अब दुकान पर जाकर पूछने लगे थे- क्या अपोलो का पाइप है?

हजारों डीलरों का बड़ा नेटवर्क

बिजनेस मॉडल की बात करें तो संजय ने डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया. उन्होंने देशभर में हजारों डीलरों का एक ऐसा जाल बिछाया कि छोटे से छोटे गांव में भी अगर किसी को घर बनाना हो, तो उसे अपोलो स्टील आसानी से मिल जाए. उन्होंने अपनी रेंज को इतना बड़ा कर दिया कि घर की खिड़की से लेकर एयरपोर्ट के बड़े शेड तक, हर जगह उनके उत्पाद फिट बैठने लगे. 2026 की शुरुआत तक, एपीएल अपोलो ने भारत के स्ट्रक्चरल स्टील बाजार के करीब 50% हिस्से पर कब्जा कर लिया है. आज कंपनी की वैल्यू हजारों करोड़ में है, लेकिन संजय के लिए यह आंकड़ा सिर्फ एक नंबर है. उनकी असली जीत उस भरोसे में है जो हर इंजीनियर उनकी कंपनी पर करता है

झटके भी झेले, मगर हिले नहीं

ग्रोथ के इस सफर में संजय को कई बार बड़े झटकों का भी सामना करना पड़ा. कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और ग्लोबल मार्केट की मंदी ने कई बार कंपनी के मुनाफे पर असर डाला. एक दौर ऐसा भी था जब भारी कर्ज और बाजार की सुस्ती के कारण विस्तार की योजनाएं रुकती हुई नजर आ रही थीं. लेकिन संजय ने कभी भी अपनी रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) का बजट कम नहीं किया. उन्होंने नए तरह के कोटिंग वाले पाइप्स और जंगरोधी स्टील पर काम जारी रखा. इसी जिद्द का नतीजा है कि आज दिल्ली मेट्रो हो या मुंबई एयरपोर्ट, भारत की हर बड़ी पहचान के पीछे संजय गुप्ता का लोहा खड़ा है.आज एपीएल अपोलो सिर्फ पाइप नहीं बना रही, बल्कि वह एक लाइफस्टाइल ब्रांड की तरह उभर रही है. संजय गुप्ता ने साबित कर दिया कि अगर आपकी सोच में दम है, तो आप उस चीज को भी ब्रांड बना सकते हैं जिसे लोग दीवार के अंदर छिपा देते हैं. उनका सफर उन सभी उद्यमियों के लिए एक सबक है जो सोचते हैं कि उनके पास जो प्रोडक्ट है वह बहुत आम है. संजय ने उस आम लोहे को खास पहचान दी. आज जब हम आधुनिक भारत के आसमान छूते ढांचे देखते हैं, तो वह संजय गुप्ता के उसी विजन की गवाही देते हैं जिसने कहा था कि लोहा सिर्फ लोहा नहीं होता, वह देश का भविष्य होता है.

APL Apollo: कंपनी की वैल्यूएशन

कंपनी की वैल्यूएशन 52,493 करोड़ रुपये की है. कंपनी और बिजनेस बहुत खास है और इस बात का सबूत है कंपनी की शेयर होल्डिंग. दिसंबर 2025 को खत्म हुई तिमाही तक कंपनी में 28.27% हिस्सेदारी प्रमोटर्स की है. प्रमोटर की हिस्सेदार से ज्यादा इसमें विदेशी निवेशक हैं. उनका प्रतिशत 33.12 है. भारत के म्यूचुअल फंडों ने भी इस कंपनी के 19.91 प्रतिशत शेयर अपने पास रखे हुए हैं. 2023 के बाद से FIIs और DIIs की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है. कंपनी का शेयर मल्टीबैगर रिटर्न दे चुका है. 9 अप्रैल 2020 में इसके एक शेयर की कीमत 133.59 रुपये थी. 2026 के 7 अप्रैल को इसकी कीमत 1890.60 रुपये है. फरवरी 2026 में इसका शेयर 2245.90 रुपये का हाई भी बना चुका है.

संजय गुप्ता की नेट वर्थ

दिसंबर 2025 की नवीनतम तिमाही शेयरहोल्डिंग घोषणाओं के आधार पर संजय गुप्ता की कुल संपत्ति लगभग 109.7 करोड़ रुपये आंकी गई है. यह उन सूचीबद्ध कंपनियों में उनकी घोषित हिस्सेदारी के कुल मूल्य को दर्शाती है, जहां उनके पास 1% से अधिक हिस्सेदारी है.

Manoj Mishra

Editor in Chief

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