सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि जो सरकारी कर्मचारी खुद रिश्वत मांगता है और स्वीकार करता है, उसे भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (PC Act) के तहत दोषी ठहराया जा सकता है, भले ही आपराधिक साज़िश का आरोप साबित न हो और सह-आरोपी बरी हो जाए।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने एक इनकम टैक्स इंस्पेक्टर की रिहाई का आदेश रद्द किया। राजस्थान हाईकोर्ट ने उसे सिर्फ इसलिए बरी किया, क्योंकि सह-आरोपी बरी हो गया और IPC की धारा 120B के तहत साज़िश के आरोप हटा दिए गए।
कोर्ट ने कहा कि भले ही साज़िश का आरोप साबित न हो, फिर भी अभियोजन पक्ष आरोपी को दोषी ठहरा सकता है, अगर सबूतों से यह स्वतंत्र रूप से साबित हो जाए कि आरोपी सरकारी कर्मचारी ने रिश्वत मांगी थी और स्वीकार की थी।
यह मामला 2010 का है, जब पवन अग्रवाल (PW1), जो एक ऐसी फर्म में पार्टनर थे, जिसका इनकम टैक्स असेसमेंट चल रहा था। उन्होंने CBI से शिकायत की कि इंस्पेक्टर बलजीत सिंह (A2) ने अपने सीनियर, जॉइंट कमिश्नर अरुण कुमार गुर्जर (A1) की तरफ से असेसमेंट को बिना किसी रुकावट के पूरा करने के लिए 5 लाख रुपये की रिश्वत मांगी थी।
CBI ने 29 दिसंबर, 2010 को एक जाल बिछाया। जाल बिछाने से पहले की कार्रवाई स्वतंत्र गवाहों की मौजूदगी में की गई और 1000 रुपये के 200 नोटों पर फिनोलफथेलिन पाउडर लगाया गया। जब PW1 ने A1 के दफ्तर में A2 को लिफाफा सौंपा तो A2 ने उसे अपने कोट की जेब में रख लिया। पहले से तय संकेत मिलते ही CBI की टीम ने A2 को पकड़ लिया। उसकी जेब से लिफाफा बरामद किया गया, और जब उसके हाथों को सोडियम कार्बोनेट के घोल में धोया गया तो वे गुलाबी हो गए, जिससे यह पुष्टि हो गई कि उसने पाउडर लगे नोटों को छुआ था।
ट्रायल कोर्ट ने A1 और A2 दोनों को IPC की धारा 120B के साथ-साथ PC Act की धारा 7 के तहत, और अलग से PC Act की धारा 7 के तहत दोषी ठहराया। उन्हें चार साल के कठोर कारावास की सज़ा सुनाई।
हालांकि, राजस्थान हाईकोर्ट ने इन दोषसिद्धियों को यह मानते हुए पलट दिया कि “साज़िश का कोई सबूत नहीं है” और “रिश्वत मांगने का भी कोई सबूत नहीं है।” अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने A1 को बरी किए जाने के खिलाफ CBI की अपील खारिज की थी। यह अपील सिर्फ़ A2 से जुड़ी थी।
सुप्रीम कोर्ट के सामने यह सवाल था कि क्या IPC की धारा 120B के तहत साज़िश का आरोप साबित न होने पर ‘भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम’ की धारा 7 के तहत भ्रष्टाचार का मुख्य आरोप भी अपने-आप खत्म हो जाता है।
विवादित फ़ैसला रद्द करते हुए जस्टिस चंद्रन ने अपने फ़ैसले में कहा कि भ्रष्टाचार का मुख्य अपराध, आपराधिक साज़िश के आरोप से अलग और स्वतंत्र होता है। इसलिए किसी सह-आरोपी के बरी होने या साज़िश का आरोप साबित न होने पर भी आरोपी (जिसके खिलाफ अपील की गई है) को अपने-आप बरी नहीं किया जा सकता; बशर्ते उसके खिलाफ रिश्वत मांगने और स्वीकार करने का आरोप अन्य सबूतों से साबित हो चुका हो।
कोर्ट ने कहा कि चूंकि आरोपी के खिलाफ रिश्वत मांगने और स्वीकार करने का आरोप साबित हो चुका था, इसलिए सह-आरोपी के साथ साज़िश करने या न करने की बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता; उसे ‘भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम’ के तहत मुख्य आरोपों से बरी नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा,
“…अगर ‘भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम’ के तहत लगाया गया आरोप, साज़िश के आरोप से जुड़ा हुआ एकमात्र आरोप होता तो अगर एक आरोप में कोई बरी हो जाता, तो दूसरे आरोप में उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता था। हालांकि, यहां दोनों आरोपियों पर रिश्वत मांगने और स्वीकार करने का एक और आरोप भी है; और ये दोनों आरोप, साज़िश के किसी ठोस आरोप से इस तरह नहीं जुड़े हैं कि उन्हें एक-दूसरे से अलग न किया जा सके। रिश्वत मांगने और स्वीकार करने का यह दूसरा आरोप, दोनों आरोपियों के खिलाफ या उनमें से किसी एक के खिलाफ भी स्वतंत्र रूप से साबित किया जा सकता है; क्योंकि यहां ऐसी कोई साज़िश या ‘दिमागों का मेल’ (Meeting of Minds) होने का आरोप नहीं लगाया गया।”
तदनुसार, अपील आंशिक रूप से स्वीकार की गई और आरोपी को बरी करने का फ़ैसला रद्द किया गया। हालांकि, आरोपी की सेहत को ध्यान में रखते हुए उसकी सज़ा को चार साल की जेल से घटाकर एक साल कर दिया गया।





