नारायणपुर: छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित जिले नारायणपुर में तस्वीरें बदल रही है. जिन इलाकों से नक्सलवाद का खात्मा हो रहा है वहां खुशियों की इबारत लिखी जा रही है. इसी क्रम में अबूझमाड़ के कुतुल एरिया जिसे नक्सलियों की राजधानी कहा जाता था. वहां आजादी के बाद पहली बार होली मनाई गई है. सुरक्षा बलों और प्रशासन के संयुक्त प्रयासों के बाद इस वर्ष यहां पहली बार ग्रामीणों और बच्चों ने खुले दिल से होली का पर्व मनाया. यहां पहली बार डर और दहशत को भुलाकर लोग होली के रंग में रंगे दिखाई दिए.
बदलते अबूझमाड़ की बदलती तस्वीर
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नक्सलवाद के खात्मे की डेडलाइन 31 मार्च 2026 तय की है. इस डेडलाइन की तारीख जैसे जैसे नजदीक आ रही है वैसे वैसे सुरक्षाबलों का ऑपरेशन और तेज हो रहा है. अबूझमाड़ के भीतरी इलाकों से सकारात्मक तस्वीरें सामने आ रही हैं. जहां कभी नक्सलियों की समानांतर व्यवस्था चलती थी, वहां अब विकास और सामान्य जीवन की बयार बहती दिखाई दे रही है. ईटीवी भारत की टीम नारायणपुर के कुतुल पहुंची. यहां रास्ते में गांव-गांव में टोली बनाकर ग्रामीण ढोल-नगाड़ों और रंग-गुलाल के साथ होली का उत्सव मनाते दिखे. यह तस्वीर इस बात की ओर इशारा कर रही थी कि यहां लोग नक्सलवाद के खात्मे से खुश हो रहे हैं.
कुतुल में बच्चों की गूंजती हंसी
ग्राम कुतुल पहुंचते ही माहौल पूरी तरह उत्सवमय दिखा. कभी नक्सलियों की पनाहगाह रहा यह गांव आज बच्चों की खिलखिलाहट से गूंज रहा था. रामकृष्ण मिशन आश्रम में पढ़ने वाले नन्हे विद्यार्थी हाथों में रंग और गुलाल लेकर घर-घर जा रहे थे. वे बड़े-बुजुर्गों के पैर छूकर आशीर्वाद ले रहे थे और सभी को रंग लगा रहे थे.पहले नक्सल प्रभाव के कारण कोई त्यौहार खुलकर नहीं मनाया जाता था. डर का माहौल रहता था. अब कैंप स्थापित होने के बाद सभी त्योहार धूमधाम से मनाए जा रहे हैं-सुनील कुमार वर्धा, ग्रामीण युवकपिछले वर्ष भी रंग केवल आश्रम परिसर तक सीमित था, लेकिन इस बार गांव में खुलकर होली खेली जा रही है-राजकुमार नूरेटी, छात्र RKM
आश्रम के शिक्षकों ने बताया कि क्षेत्र में सुरक्षा कैंप स्थापित होने के बाद सड़क निर्माण कार्य तेज हुआ है. अब आवागमन आसान हो रहा है, स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाएं पहुंच रही हैं. ग्रामीणों का भरोसा लौटा है और वे अब सामाजिक व सांस्कृतिक पर्वों को खुले मन से मना रहे हैं.
अब गांव में रातें सन्नाटे और भय में नहीं, बल्कि शांति में गुजरती हैं. होली के इस पर्व ने वर्षों की दहशत को जैसे रंगों में घोल दिया हो- सुखचंद मंडावी, शिक्षक
नक्सलवाद से विकासवाद की ओर
अबूझमाड़, जो कभी लाल आतंक के कारण सुर्खियों में रहता था, आज विकास और सामान्य जीवन की ओर बढ़ता नजर आ रहा है. बच्चों का नाचना-गाना, एक-दूसरे को रंग लगाना और बेखौफ मुस्कुराना इस बात का संकेत है कि यहां खुशियों के नए अध्याय की शुरुआत हो चुकी है.
ग्राम कुतुल में मनाई गई यह होली केवल एक त्यौहार नहीं, बल्कि परिवर्तन का प्रतीक है. यह उस विश्वास का रंग है जो वर्षों बाद ग्रामीणों के चेहरों पर लौटा है. अबूझमाड़ के घने जंगलों में गूंजती बच्चों की हंसी और रंगों की उड़ती बौछारें यह संदेश दे रही हैं कि नक्सलवाद की अंधेरी सुरंग के बाद विकास और शांति की रोशनी दिखाई देने लगी है. यह होली केवल रंगों की नहीं, बल्कि आज़ादी, आत्मविश्वास और नए भविष्य की होली है.





