बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस ने सोमवार को इस्तीफ़ा दे दिया लेकिन सत्ता से जाते-जाते एक बार फिर से भारत को असहज करने वाला बयान दिया है.
सोमवार को अपने विदाई भाषण में मोहम्मद यूनुस ने कहा, ”हमारा खुला समंदर न केवल बांग्लादेश की भौगोलिक सीमा है बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था से संपर्क के लिए खुला दरवाज़ा भी है. इस इलाक़े में नेपाल, भूटान और सेवन सिस्टर्स के पास जबर्दस्त आर्थिक सामर्थ्य है.”
पूर्वोत्तर भारत के सात राज्यों- अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नगालैंड और त्रिपुरा को एक साथ सेवन सिस्टर्स कहा जाता है.
मोहम्मद यूनुस ने जब ‘सेवन सिस्टर्स’ का ज़िक्र किया तो भारत का नाम नहीं लिया.
बिना भारत का नाम लिए सेवन सिस्टर्स का स्वतंत्र रूप से ज़िक्र करने का अर्थ यह भी निकाला जा रहा है कि मोहम्मद यूनूस ने भारत के इन राज्यों की राष्ट्रीयता अलग करके देखी है. यह कोई पहली बार नहीं है, जब मोहम्मद यूनुस ने सेवन सिस्टर्स का उल्लेख इस तरह से किया है
पिछले साल मोहम्मद यूनुस 26 से 29 मार्च तक चीन के दौरे पर थे. इस दौरे में भी यूनुस ने सेवन सिस्टर्स का हवाला दिया था.
मोहम्मद यूनुस ने कहा था कि सेवन सिस्टर्स का समंदर से कोई कनेक्शन नहीं है और बांग्लादेश ही इस इलाक़े का अभिभावक है.
यूनुस ने कहा था, ”भारत के सेवन सिस्टर्स राज्य लैंडलॉक्ड हैं. इनका समंदर से कोई संपर्क नहीं है. इस इलाक़े के अभिभावक हम हैं. चीन की अर्थव्यवस्था के लिए यहाँ पर्याप्त संभावनाएं हैं. चीन यहाँ कई चीज़ें बना सकता है और पूरी दुनिया में आपूर्ति कर सकता है.”
मोहम्मद यूनुस की इस टिप्पणी पर आपत्ति जताते हुए असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने एक्स पर लिखा था, ”पूर्वोत्तर भारत के सेवन सिस्टर्स राज्यों को लैंडलॉक्ड बताना और बांग्लादेश को उनके लिए समंदर तक पहुंच का एकमात्र अभिभावक बताना आपत्तिजनक और निंदनीय है. मोहम्मद यूनुस के ऐसे भड़काऊ बयानों को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए क्योंकि ये गहरे रणनीतिक विचारों और लंबे समय से चले आ रहे एजेंडे को दर्शाते हैं.”
दरअसल भारत का यह इलाक़ा काफ़ी संवेदनशील माना जाता है. ख़ासकर सिलीगुड़ी कॉरिडोर के कारण. महज 22 किलोमीटर चौड़े इस कॉरिडोर के ज़रिए ही पूर्वोत्तर भारत का बाक़ी भारत से ज़मीन से जुड़ाव है.
बांग्लादेश और नेपाल भी इसी कॉरिडोर के साथ सीमा साझा करते हैं. इसे ‘चिकन नेक’ भी कहा जाता है. भूटान और चीन भी इस कॉरिडोर से महज कुछ किलोमीटर ही दूर हैं.
पूर्वोत्तर भारत के सेवन सिस्टर स्टेट्स भौगोलिक रूप से बांग्लादेश, भूटान, चीन और म्यांमार से घिरे हैं. यानी इनका समंदर से कोई संपर्क नहीं है. भारत से ज़मीन से जो संपर्क है, वो सिलीगुड़ी कॉरिडोर को ज़रिए है. ऐसे में मोहम्मद यूनुस के बयान पर पिछले साल भी विवाद हुआ था.
सेवन सिस्टर्स के एक राज्य अरुणाचल प्रदेश पर चीन पहले से ही दावा करता है. चीन इसे दक्षिणी तिब्बत कहता है. यहाँ तक कि चीन ने अरुणाचल प्रदेश के कई इलाक़ों के नाम चीनी भाषा में रख दिए हैं. भारत ने जवाब में कहा था कि नाम बदलने से हक़ीक़त नहीं बदल जाएगी.
जब चीन में मोहम्मद यूनुस ने सेवन सिस्टर्स के लैंडलॉक्ड होने का हवाला दिया था तब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आर्थिक सलाहकार ने एक्स पर लिखा था, “यह दिलचस्प है कि यूनुस चीन से सार्वजनिक अपील इस आधार पर कर रहे हैं कि भारत के सात राज्य लैंडलॉक्ड हैं. चीन का बांग्लादेश में निवेश करने के लिए स्वागत है, लेकिन भारत के सात राज्यों के लैंडलॉक्ड होने का वास्तव में क्या महत्व है?”
सेवन सिस्टर्स पर निशाना
भारत में तब भी इस बयान को उकसाने वाला माना गया था और अब सत्ता से विदाई के वक़्त भी मोहम्मद यूनुस ने उसी बयान को दोहराया है.
लेकिन बात केवल मोहम्मद यूनुस की ही नहीं है. जिन छात्रों के आंदोलन के दम पर यूनुस सत्ता में आए थे, उन छात्र नेताओं ने भी सेवन सिस्टर्स को लेकर विवादित बयान दिए हैं.
पिछले साल दिसंबर में बांग्लादेश की नेशनल सिटिजन पार्टी (एनसीपी) के सदर्न चीफ़ ऑर्गेनाइजर हसनत अब्दुल्लाह ने चेतावनी देते हुए कहा था कि अगर बांग्लादेश को अस्थिर किया गया तो भारत के पूर्वोत्तर राज्यों सेवन सिस्टर्स को अलग-थलग कर दिया जाएगा.
हसनत ने कहा था, ”मैं भारत से स्पष्ट कहना चाहता हूँ कि बांग्लादेश की संप्रभुता, क्षमता, हमारे मताधिकार और मानवाधिकार का सम्मान नहीं करने वाली ताक़तों को पनाह देगा तो हमारी तरफ़ से इसका जवाब मिलेगा. बांग्लादेश की अस्थिरता का असर पूरे इलाक़े पर होगा. अगर बांग्लादेश अस्थिर हुआ तो इसकी आग सरहद से बाहर भी फैलेगी.”
पिछले साल अप्रैल महीने में बांग्लादेश के पूर्व सेना अधिकारी और मोहम्मद यूनुस के क़रीबी सहयोगी मेजर जनरल (रिटायर्ड) ने कहा था कि भारत अगर पहलगाम में हमले के जवाब में पाकिस्तान पर हमला करता है तो बांग्लादेश को भारत के पूर्वोत्तर राज्यों पर क़ब्ज़े के लिए चीन के साथ सहयोग करना चाहिए. हालांकि मोहम्मद यूनुस की सरकार से इस बयान से ख़ुद को अलग कर लिया था.
29 अप्रैल को एक फेसबुक पोस्ट में फ़ज़लुर रहमान ने बांग्ला में लिखा था, “अगर भारत पाकिस्तान पर हमला करता है तो बांग्लादेश को पूर्वोत्तर भारत के सात राज्यों पर क़ब्ज़ा कर लेना चाहिए. मुझे लगता है कि इस संदर्भ में चीन के साथ संयुक्त सैन्य व्यवस्था पर चर्चा शुरू करना ज़रूरी है.”
मोहम्मद यूनुस भले पूर्वोत्तर भारत के सात राज्यों के लैंडलॉक्ड होने की बात कर रहे हैं लेकिन दूसरी सच्चाई यह भी है कि बांग्लादेश इंडिया लॉक्ड मुल्क है. बांग्लादेश की 94 प्रतिशत सीमा भारत से लगती है. भारत और बांग्लादेश के बीच 4,367 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है और यह उसकी अंतरराष्ट्रीय सीमा का 94 फ़ीसदी है. यानी बांग्लादेश लगभग चारों तरफ़ से भारत से घिरा हुआ है.
ऐसे में बांग्लादेश सुरक्षा और व्यापार के मामले में भारत पर निर्भर है. लेकिन दूसरी तरफ़ बांग्लादेश से भारत को पूर्वोत्तर के राज्यों में सस्ते और सुलभ संपर्क में मदद मिलती है. पूर्वोत्तर के राज्यों से बाक़ी भारत को जोड़ने में बांग्लादेश की अहम भूमिका है. पूर्वोत्तर भारत के कई राज्यों में बांग्लादेश के ज़रिए पहुँचना ज़्यादा आसान है.
ट्रांजिट पर बांग्लादेश तैयार नहीं
पिछले साल सोशल मीडिया पर इस बात की काफ़ी चर्चा थी कि बांग्लादेश लालमोनिरहाट में चीन के सहयोग से बने एक पुराने एयरबेस को फिर से ऑपरेशनल बना रहा है.
यह भारत की सीमा से महज 12-15 किलोमीटर दूर है और सिलीगुड़ी कॉरिडोर से लगभग 135 किलोमीटर.
बांग्लादेश के साथ बातचीत में पूर्वोत्तर भारत के लिए ट्रांजिट का मुद्दा काफ़ी अहम रहा है. असम, नगालैंड, त्रिपुरा, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश को बांग्लादेश के माध्यम से भारत के बाक़ी हिस्सों से जोड़ने का प्रस्ताव अहम रहा है.
जापान में बांग्लादेश के राजदूत रहे सिराजुल इस्लाम ने में लिखा था कि भारत इन राज्यों के लिए चटगांव पोर्ट के उपयोग की भी मांग करता है.
सिराजुल इस्लाम ने लिखा था, ”मुद्दा 1972 के बांग्लादेश-भारत व्यापार समझौते के समय से लंबित है, जिसमें व्यापार के लिए एक-दूसरे के देशों में रेलमार्ग, जलमार्ग और सड़कों के उपयोग का प्रावधान किया गया था. भारत इसे एक आर्थिक मुद्दे के तौर पर पेश करता है. मेरा मानना है कि यह मुद्दा बहुत ही संवेदनशील है. बांग्लादेश की सभी पूर्ववर्ती सरकारें, राजनीतिक दल, सिविल सोसाइटी और आम जनता इस प्रस्ताव को अस्वीकार करते रहे हैं. एक ऐसे देश में, जहाँ राष्ट्रीय मुद्दों पर द्विदलीय सहमति दुर्लभ है, यह विषय बीएनपी और शेख़ हसीना दोनों को एकजुट कर देता है.”




