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लिव-इन संबंध में रहने वाला पुरुष क्या धारा 498ए के तहत अभियोजित हो सकता है? सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर विचार करने का निर्णय लिया, क्या विवाह सदृश लिव-इन संबंध में रहने वाला पुरुष, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498ए या भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की समकक्ष धारा 85 के तहत क्रूरता के अपराध में अभियोजित किया जा सकता है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ लोकेश बी.एच. एवं अन्य द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई कर रही थी। यह याचिका 18 नवंबर, 2025 को कर्नाटक हाइकोर्ट द्वारा पारित निर्णय को चुनौती देती है।

13 फरवरी, 2026 के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस याचिका में सुनवाई योग्य प्रमुख प्रश्न यह है कि क्या लिव-इन संबंध या विवाह की प्रकृति वाले संबंध में रह रहा पुरुष धारा 498ए के तहत अभियोजित किया जा सकता है।

धारा 498ए पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा विवाहित महिला के साथ की गई क्रूरता को दंडनीय बनाती है। अदालत के समक्ष यह प्रश्न है कि क्या यह दंडात्मक प्रावधान उन संबंधों पर भी लागू होगा, जिन्हें विवाह के समान माना जाता है।

मामले की महत्ता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने विधि एवं न्याय मंत्रालय के माध्यम से केंद्र सरकार को पक्षकार बनाया और याचिकाकर्ताओं को एक सप्ताह के भीतर संशोधित पक्षकार सूची दाखिल करने का निर्देश दिया। एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से केंद्र की ओर से अदालत की सहायता करने का अनुरोध किया गया। साथ ही नीना आर. नरीमन को एमिक्स क्यूरी नियुक्त किया गया और उनसे अगली सुनवाई से पहले लिखित प्रस्तुति दाखिल करने को कहा गया।

कानूनी प्रश्न पर अंतिम निर्णय तक अदालत ने मामले की आगे की कार्यवाही पर रोक लगाई। प्रकरण को 9 मार्च 2026 के लिए सूचीबद्ध किया गया।

यह विशेष अनुमति याचिका कर्नाटक हाइकोर्ट के उस निर्णय के विरुद्ध दायर की गई, जिसमें कहा गया कि धारा 498ए लिव-इन संबंधों पर भी लागू हो सकती है।

मूल शिकायत में महिला ने आरोप लगाया कि पुरुष ने दहेज की मांग को लेकर उसके साथ उत्पीड़न किया और उसे जलाने का प्रयास किया। यह भी कहा गया कि पुरुष का पहले से वैध विवाह विद्यमान था। कार्यवाही को यह कहते हुए निरस्त करने की मांग की गई कि जब विवाह प्रारंभ से ही शून्य है तो धारा 498ए लागू नहीं हो सकती।

हालांकि, कर्नाटक हाइकोर्ट ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि धारा 498ए में प्रयुक्त “पति” शब्द की संकीर्ण या तकनीकी व्याख्या नहीं की जा सकती, जिससे विवाह सदृश संबंधों को बाहर कर दिया जाए। हाइकोर्ट ने कहा कि इस प्रावधान का उद्देश्य महिलाओं को क्रूरता से संरक्षण देना है और केवल इस आधार पर संरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता कि विवाह शून्य या अवैध था अथवा पक्षकार लिव-इन व्यवस्था में रह रहे थे।

हाइकोर्ट ने यह भी कहा था कि जहां पक्षकार पति-पत्नी की तरह साथ रहते हैं। संबंध में विवाह की आवश्यक विशेषताएं मौजूद हैं। वहां यदि वैधानिक तत्व पूरे होते हैं तो आपराधिक दायित्व उत्पन्न हो सकता है। प्रथमदृष्टया आरोपों को विचारणीय मानते हुए हाइकोर्ट ने कार्यवाही निरस्त करने से इनकार कर दिया था।

अब इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय देशभर में लिव-इन संबंधों से जुड़े आपराधिक मामलों पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।

Manoj Mishra

Editor in Chief

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