गया: बिहार के गया के आमस प्रखंड के कोरमथू 8इन दिनों बदली हुई है. अपने बच्चों को ‘जेंटलमैन’ बनते देख मां-बाप काफी खुश हैं. दरअसल, प्राथमिक विद्यालय में काफी समय से बच्चों के यूनिफॉर्म, साफ-सफाई, स्वच्छता और अनुशासन पर विशेष जोर दिया जा रहा है. गले में टाई लगाकर जब ये स्कूल जाते हैं तो जहां बच्चे ‘जेंटलमैन’ दिखते हैं, वहीं माता-पिता गर्व महसूस करते हैं.
यूनिफॉर्म में दिखते हैं स्कूली बच्चे: 8 वर्षीय छात्र किशन मांझी और सुजीत कुमार हर दिन अपने गांव के प्रथमिक विद्यालय पढ़ने जाते हैं. स्कूल जाने से पहले उनकी खुशियों का ठिकाना नहीं रहता है क्योंकि इन दिनों वो स्कूल ड्रेस पर ‘टाई’ पहनकर जा रहे हैं. पहली बार टाई पहनने की खुशी उनके चेहरे से साफ झलक भी रही थी.
आज स्कूल जाने के लिए सपनों का ड्रेस कोड पूरा हो गया है. टाई पहन कर वो जेंटलमैन लग रहा है. पहले दूसरे सरकारी विद्यालय में पढ़ता था लेकिन अब इसी सेशन में उसने प्राथमिक विद्यालय कोरमथु एससी में नामांकन कराया है. यहां स्कूल के शिक्षक इमरोज अली ने उन्हें टाई बेल्ट दिया है, जिसे पहनकर वो स्कूल पहुंचता है.”- सुजीत कुमार मांझी, छात्र
किशन कुमार मांझी स्कूल जाने से पहले स्नान करता है. फिर मां उसे अपने हाथों से टाई पहनाती है. हालांकि ये स्कूली छात्रों के लिए कोई नई बात नहीं है, क्योंकि स्कूल का अपना ड्रेस कोड होता है मगर हम जिस छात्र किशन और सुजीत की बात कर रहे हैं, उसके लिए टाई पहनना आम बात नहीं है. गरीब और दलित समाज से संबंध रखने वाले छात्र गांव की झोपड़ी में रहते हैं लेकिन पढ़ाई के लिए उनका सपना किसी बड़े स्कूल के छात्रों से कम नहीं है
“मैंने पहली बार बेटे के मुंह से ही टाई के बारे में सुना था. पता नहीं था कि टाई क्या होती है लेकिन अब वह खुद ही अपने बेटे को हर दिन स्कूल जाने के लिए तैयार करती हैं. अपने हाथों से बेटे को टाई लगाती हूं. एक मां के लिए इससे बड़ी खुशी क्या होगी कि बेटे को अभी कम उम्र से ही पहनावे को लेकर जागरूकता है.”-राजमणि देवी, अभिभावक
बेटे को यूनिफॉर्म में देख खुश हैं मां:बेटे की बातों को सुनकर मां भावुक हो जाती हैं. वह कहती हैं उनकी ऐसी स्थिति नहीं है कि वो अपने बच्चों को निजी विद्यालय की तरह वेल मेंटेन ड्रेस में भेजे. बस उसके लिए इतना ही काफी है कि बेटा पढ़ने स्कूल जाए. अब क्या फर्क पड़ता है कि कौन से कपड़े पहन कर बच्चे स्कूल जाते हैं. हालांकि ऐसा नहीं है कि सिर्फ सुजीत कुमार, किशन मांझी और उनकी मां को टाई की खुशी है, बल्कि इस गांव के दर्जनों छात्रों और उनके परिवार के दौरान ऐसी वेल मेंटेन ड्रेस की खुशियां हैं.
कोरमथू गांव में 1000 से अधिक घर होंगे, जिनमें 1200 से अधिक दलित समुदाय के लोग भी रहते हैं. गांव में 3 विद्यालय हैं, जिनमें एक प्राथमिक विद्यालय एससी है. इसी सरकारी विद्यालय के शिक्षकों ने बच्चों के रहन-सहन और ड्रेसिंग सेंस की तस्वीर बदली है. गांव के लोग भी मानते हैं कि विद्यालय सिर्फ पढ़ाई का केंद्र ही नहीं, बल्कि उनकी उम्मीद अनुशासन और सपनों को परवान चढ़ाने वाला केंद्र है. उनके बच्चों के स्कूली ड्रेस और उनके अनुशासन दूसरे विद्यालय के छात्र और शिक्षक भी अपनाते हैं
जेंटलमैन बन कर पहुंचते हैं छात्र:गांव के ही एक अभिभावक सुनील कुमार मांझी कहते हैं कि यहां बच्चे सिर्फ शिक्षा के लिए नहीं, बल्कि अनुशासन रहन-सहन, पहनावे के तौर तरीके और संस्कार भी सीखते हैं. ड्रेस तो उन्हें बिहार शिक्षा विभाग की योजना के तहत ही मिला था लेकिन टाई बेल्ट स्कूल के शिक्षकों के द्वारा दिया जाता है. शिक्षक इसके लिए छात्रों से कोई कीमत नहीं लेते हैं. बच्चों की पढ़ाई के साथ ही खेल में अच्छे प्रदर्शन के लिए भी प्रेरित करते हैं.
“जब हमारे गांव के बच्चे साफ सुथरा ड्रेस बेल्ट टाई जूता मोजा पहनकर विद्यालय जाते हैं तो हमारे मोहल्ले की तस्वीर बदली हुई नजर आती है. लगता ही नहीं है कि हम लोग कमजोर वर्ग से हैं. हमारे बच्चों को देखकर आप अंदाजा नहीं लगाएंगे, क्योंकि वो यूनिफार्म को ना सिर्फ पहनते हैं बल्कि उसको निजी विद्यालय के छात्रों की तरह ही मेंटेन रखने की आदत है.”- सुनील कुमार मांझी, अभिभावक
टाई और साबुन बैंक:स्कूल के हेड मास्टर सुरेश चौधरी कहते हैं कि इस अनूठी पहल की शुरुआत स्कूल के शिक्षक इमरोज अली ने की थी. इमरोज अली और अन्य शिक्षकों का ही ‘साबुन और टाई बैंक’ संचालित करने का आइडिया था. इन बैंकों का संचालन खुद छात्र ही करते हैं. इसके लिए छात्रों की एक कमेटी भी गठित है और वही सारा लेखा जोखा रखते हैं. इसमें शिक्षकों का हस्तक्षेप नहीं होता है, बल्कि वो सिर्फ निगरानी रखते हैं. पूरी तरह से छात्रों का ये बैंक छात्रों के द्वारा ही संचालित होता हैहम चाहते हैं कि उनके विद्यालय के छात्र भी निजी विद्यालयों के छात्रों की तरह ही वेल मेंटेन होकर स्कूल के यूनिफॉर्म गले में टाई बेल्ट जूते मोजे पहनकर पहुंचे, जिस उद्देश्य के तहत टाई और साबुन बैंक की शुरुआत हुई थी. उसमें 90 प्रतिशत तक सफलता मिल चुकी है.”- इमरोज अली, शिक्षक
एक-दूसरे को देख कर प्रेरित होते हैं छात्र:शिक्षक इमरोज अली कहते हैं कि इस तरह की पहल इसलिए की गई ताकि उनके विद्यालय में जितने छात्र-छात्राओं का नामांकन हुआ है, वो नियमित रूप से विद्यालय आएं. उन्हें देखकर दूसरे विद्यालय के छात्र प्रेरित होते हैं, उन्हें खुद पर भरोसा पैदा होता है और वो अनुशासन का पालन करते हैं.
99 प्रतिशत होती है हाजिरी:प्राथमिक विद्यालय कोरमथु में छात्र-छात्राएं सरकार के द्वारा दिए जाने वाले नीले पोशाक पर गले में टाई और कमर में बेल्ट लगते हैं, बेल्ट के बक्कल पर निजी विद्यालयों के बेल्ट की तरह ही उस पर स्कूल और उसका पता अंकित है, इसे देखकर कोई भी अचंभित रह सकता है. जिले का पहला ऐसा सरकारी स्कूल होगा, जिसके बेल्ट के बक्कल पर विद्यालय का पूरा नाम पता लिखा हुआ है.
प्राथमिक विद्यालय में 10 साल से कम उम्र के बच्चे पढ़ते हैं. ऐसे में इस तरह की योजना और पहल से छात्र-छात्राओं में पढ़ाई को लेकर रुचि बढ़ी है. यही वजह है कि छात्रों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि आई है. इस विद्यालय में 99 फीसदी तक बच्चे उपस्थिति दर्ज कराते हैं.
टाई बेल्ट के साथ साबुन बैंक:यहां विद्यालय में एक साबुन बैंक भी है. स्कूल के बच्चे महीने में एक बार यहां एक साबुन जमा करते हैं और जरूरत के अनुसार उसे निकालते भी हैं. साबुन बैंक का भी संचालन छात्रा ही करते हैं. इस बैंक के अध्यक्ष पांचवी कक्षा के किशन कुमार कहते हैं कि साबुन की पूरी सूची रजिस्टर में दर्ज है कि कब किस छात्र को घर में नहाने के लिए साबुन दिए गए है. हर दिन यहां छात्र-छात्राएं मध्यान भोजन से पहले हाथ धोते हैं. बैंक से साबुन निकाला जाता है और फिर छात्र-छात्राएं उसका उपयोग करती हैं
ऐसे कैसे मिला आइडिया?: छात्रों के लिए टाई बेल्ट और साबुन बैंक की शुरुआत करने के उद्देश्य पर यहां के शिक्षकों का कहना है कि यह अनूठी पहल तब आई, जब एक छात्र एक दिन निजी विद्यालयों में जाने वाले छात्रों को टकटकी नजर से देख रहा था. उसने कुछ बोला तो नहीं लेकिन शिक्षक इमरोज़ अली को उसकी यह मासूमियत भा गई. उसके बाद शिक्षकों से सलाह मशवरे के बाद यह निर्णय हुआ कि शिक्षक अपना पैसा मिला कर स्कूल के नामांकित छात्र-छात्राओं के लिए बेल्ट और टाई के साथ किताब रखने वाला बैग खरीद कर देंगे.
बैंक में ऐसा होता योगदान:पहले तो साबुन बैंक और टाई की राशि इमरोज अली और अन्य शिक्षकों के द्वारा दी जाती थी, बाद में टाई और बेल्ट को खेल प्रतियोगिता से जोड़ दिया गया. जो टीम जीत दर्ज करती थी, उस की खुशी में सहयोग राशि लेकर छात्रों के चिल्ड्रेन बैंक में जमा किया जाता था. फिर उस पैसे के सदुपयोग के लिए बेल्ट खरीदा गया और फिर छात्रों को बांटा गया, फिर टाई बैंक खोला गया और बाद में साबुन बैंक खोला गया है.
साबुन बैंक में छात्र भी करते हैं सहयोग:साबुन बैंक ने ही दलित समुदाय की बस्ती में भी स्वक्षता लाने में सहयोग किया है. एक छात्रा शिवानी कुमारी कहती है कि पहले उसके घर में अधिकतर लोग मिट्टी से नहाते थे. खाने से पहले हाथ नहीं धोते थे लेकिन साबुन बैंक खुलने से हम लोगों की आदत साबुन उपयोग करने की हो गई है. ऐसे मजबूरी में ही सही माता पिता को साबुन लाना पड़ता है.
“जब हमारे घर में साबुन खत्म हो जाता है तो हम लोग अपने स्कूल से साबुन लेकर चले जाते हैं लेकिन इसके लिए पहले साबुन बैंक के अध्यक्ष से मंजूरी लेनी पड़ती है. हम लोग भी महीने में एक बार एक साबुन लाकर साबुन बैंक में रखते हैं. यह हमारे लिए ही बैंक खुला है. लगभग तीन साबुन हम महीने में उपयोग कर लेते हैं बाकी दो साबुन यहां के शिक्षकों के द्वारा उपलब्ध कराया जाता है.”- शिवानी कुमारी, छात्रा





