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UN में सेवा और 30 साल की कलेक्टरी, फिर सिनेमा के जुनून में छोड़ी IAS की कुर्सी, पहली ही फिल्म ने जिताया नेशनल अवॉर्ड

भारत में एक प्रशासनिक अधिकारी बनना लाखों युवाओं का सपना होता है। इस पद के साथ मिलने वाला सम्मान, स्थिरता और शक्ति किसी को भी प्राउड फील करा सकती है, लेकिन कल्पना कीजिए उस व्यक्ति के बारे में जिसने दशकों तक व्यवस्था के सबसे ऊंचे पदों पर काम किया हो और अचानक अपनी जमी-जमाई नौकरी छोड़कर फिल्म निर्माण जैसी अनिश्चित दुनिया में कदम रखने का फैसला कर ले। यह कहानी एक ऐसे ही जुनूनी शख्स की है, जिन्होंने साबित कर दिया कि अपने सपनों को पूरा करने के लिए उम्र या पद कभी बाधा नहीं बनते। उन्होंने फाइलों और दफ्तरों की दुनिया को अलविदा कहकर कैमरों और कहानियों की दुनिया को अपनी नई पहचान बनाया।

प्रशासनिक करियर का किया त्याग

यह असाधारण कहानी है पापा राव बियाला की, जिन्हें प्रशासनिक गलियारों में बीवीपी राव के नाम से जाना जाता था। वे 1982 बैच के एक वरिष्ठ अधिकारी थे। उस्मानिया विश्वविद्यालय से कानून में स्नातक करने के बाद उन्होंने देश के विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर अपनी सेवाएं दीं। वे असम में गृह सचिव जैसे संवेदनशील पद पर रहे और संयुक्त राष्ट्र के मिशन के तहत कोसोवो में भी अपनी जिम्मेदारी निभाई। तेलंगाना सरकार में नीति सलाहकार के रूप में उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त था, लेकिन इन सबके बीच उनके भीतर का एक कलाकार हमेशा बाहर आने के लिए छटपटाता रहा।

टॉम ऑल्टर और कला का प्रभाव

90 के दशक के दौरान पापा राव के जीवन में एक बड़ा मोड़ आया जब उनके मित्र और दिग्गज अभिनेता टॉम ऑल्टर ने उनकी मुलाकात मशहूर निर्देशक जाह्नू बरुआ से कराई। इस मुलाकात ने उनके भीतर छिपी रचनात्मकता को एक नई दिशा दी। प्रशासनिक कार्यों में व्यस्त रहने के बावजूद उन्होंने 1996 में न्यूयॉर्क फिल्म अकादमी से फिल्म निर्माण की बारीकियों को सीखने के लिए डिप्लोमा किया। उनकी पहली कोशिश एक डॉक्यूमेंट्री के रूप में सामने आई, जिसका शीर्षक था ‘विलिंग टू सैकरीफाइस’। इस डॉक्यूमेंट्री को राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि उनकी प्रतिभा केवल फाइलों तक सीमित नहीं है।

सिनेमा के लिए प्रशासनिक सेवा से विदाई

हालांकि पहली डॉक्यूमेंट्री के बाद वे वापस अपनी सरकारी ड्यूटी में लौट गए थे, लेकिन सिनेमा के प्रति उनका लगाव कम नहीं हुआ। आखिर साल 2020 में उन्होंने भारतीय खेल प्राधिकरण के अपने पद से इस्तीफा दे दिया ताकि वे अपनी फिल्म निर्माण की इच्छा को पूरा समय दे सकें। साल 2023 में उनकी पहली फीचर फिल्म ‘म्यूजिक स्कूल’ बड़े पर्दे पर रिलीज हुई। इस फिल्म में श्रिया सरन और शरमन जोशी ने अहम भूमिकाएं निभाईं। यह फिल्म समाज की उस कड़ी सच्चाई को दर्शाती है जहां बच्चे पढ़ाई के दबाव में अपनी रचनात्मकता खो देते हैं। फिल्म को अपनी कहानी और भावनात्मक गहराई के लिए आलोचकों से काफी सराहना मिली।

आगे क्या करने वाले हैं पापा राव

पापा राव का मानना है कि प्रशासनिक कार्यों की तुलना में फिल्म बनाना उन्हें कम तनावपूर्ण लगता है। एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि जहां प्रशासन में उन्हें प्रधानमंत्री की सुरक्षा से लेकर आपातकालीन योजनाओं तक का प्रबंधन करना पड़ता था, वहीं फिल्म निर्माण उन्हें अपनी बात कहने की आजादी देता है। आज वे पूरी तरह से एक फिल्मकार के रूप में सक्रिय हैं। हालांकि उन्होंने अपनी अगली फिल्म की आधिकारिक घोषणा अभी नहीं की है, लेकिन वे पूरी लगन के साथ उसकी तैयारियों में जुटे हुए हैं।

Manoj Mishra

Editor in Chief

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