न जाने कितने दशकों तक खोजकर्ताओं/पर्वतारोहियों ने नंदा देवी को घेरने वाली विशाल दीवारों को पार करने की कोशिश की, लेकिन वे सफल नहीं हो सके. लेकिन साल 1934 में केवल £300 (₹3,900 से ₹4,500) और अटूट साहस के साथ एक छोटी टीम ने आखिरकार नंदा देवी के रहस्य को सुलझा दिया. आइए पढ़ते हैं E. E. Shipton की किताब Nanda Deviसे निकली हुई एक कहानी के बारे में जिसे पढ़कर आप पर्वतारोहियों की हिम्मत से हैरान रह जाएंगे.गढ़वाल हिमालय में एक ऐसा पर्वत है जिसने सदियों तक इंसानों की कोशिशों को चुनौती दी है. Nanda Devi – जिसे “धन्य देवी” कहा जाता है, ये 25,660 फीट ऊंची है और चारों तरफ से एक मजबूत प्राकृतिक किले से घिरी हुई है. इस किले में 21,000 फीट से ऊंची 30 से ज्यादा चोटियां हैं और 17,000 फीट से नीचे कोई दर्रा नहीं है.इस किले में सिर्फ एक ही रास्ता है- एक बेहद खतरनाक घाटी, जिसे हिंदू मान्यताओं में सात ऋषियों का निवास स्थान माना गया है, जहाँ वे शांति से तप कर सकें.
ब्रिटेन के मशहूर खोजकर्ता ह्यूग रटलेज ने 1932 में इस जगह तक पहुंचने की कोशिश की, लेकिन उन्हें वापस लौटना पड़ा. उन्होंने इस जगह को “उत्तरी ध्रुव से भी ज्यादा कठिन” बताया था. इसके बाद दो दोस्तों ने, जिनके पास न पैसा था और न ज्यादा साधन, फिर भी कोशिश करने का फैसला किया.
£300 का छोटा लेकिन बड़ा अभियान
एरिक शिप्टन और एच. डब्ल्यू. टिलमैन एक अलग तरह की जोड़ी थे. टिलमैन हाल ही में अकेले साइकिल से अफ्रीका पार करके आए थे सिर्फ इसलिए क्योंकि यह सस्ता तरीका था. उन्होंने पूरे रास्ते साधारण खाना खाया और बीमारियों को भी यात्रा का हिस्सा माना. जब शिप्टन ने उन्हें अपनी योजना बताई, तो उन्होंने तुरंत साथ आने का फैसला कर लिया.
इस पूरे अभियान का खर्च सिर्फ £300 (तब के ₹3,900 से ₹4,500) था और उनकी टीम में थे- दो अंग्रेज, तीन शेरपा — अंगथार्के, पासांग और कुसांग. ये न तो कोई बड़ी टीम थी और न भारी सामान, न कोई सुरक्षा व्यवस्था. फिर भी वे सफल हुए.
वह घाटी जिसने सबको रोक दिया
नंदा देवी तक पहुंचने का रास्ता Rishi Ganga Gorge से होकर जाता है. यह घाटी इतनी खतरनाक है कि इसकी दीवारें सीधी ऊपर हजारों फीट तक जाती हैं और नीचे तेज बहती नदी है. पहले भी कई लोग यहां तक आए, लेकिन वापस लौट गए.1883 में ग्राहम आए, लेकिन उनके साथी डरकर भाग गए. 1907 में लॉन्गस्टाफ आए, लेकिन वे भी आगे नहीं बढ़ सके लेकिन जब शिप्टन और टिलमैन यहां पहुंचे, तो रास्ता बेहद मुश्किल था, कहीं सिर्फ पैर रखने भर की जगह. नीचे गहरी खाई और कई बार तेज नदी को पार करना. एक बार नदी पार करते समय अंगथार्के लगभग बह ही गए थे, लेकिन पासांग ने उन्हें बचा लिया.
शिप्टन ने लिखा कि अगर पानी थोड़ा और ऊँचा होता, तो वे भी बह जाते. फिर भी वे बार-बार वही जोखिम उठाते रहे.
“बहुत अच्छा, साहब!”
एक दिन बहुत कोशिश के बाद भी रास्ता नहीं मिला. सब निराश थे, तभी टिलमैन और अंगथार्के दूसरी तरफ गए और एक नया रास्ता खोज लिया. जब वे वापस आए, तो अंगथार्के ने कहा- “बहुत अच्छा, साहब, बहुत अच्छा.” उन्हें वह रास्ता मिल गया था, जो सीधे नंदा देवी के अंदर ले जाता था.
नंदा देवी की एक छुपी हुई दुनिया
जून 1934 में जब ये पांचों लोग अंदर पहुंचे, तो उनके सामने एक अद्भुत दुनिया थी. चारों तरफ बर्फ से ढकी ऊंची चोटियां, बीच में हरे-भरे मैदान, जंगली जानवर (भराल) बिना डर के घूमते हुए, रंग-बिरंगे फूल और सबसे ऊपर नंदा देवी की विशाल चोटी, जो आसमान में अलग ही दुनिया जैसी लग रही थी. चारों ओर गहरा सन्नाटा था, जिसे सिर्फ हवा और ग्लेशियर की आवाज तोड़ती थी. शिप्टन ने लिखा यह जगह उनके बचपन के सपनों जैसी थी, एक ऐसी घाटी, जहाँ वे आज़ादी से घूम सकें और नई दुनिया खोज सकें.
असली हीरो- शेरपा साथी
इस अभियान की सफलता सिर्फ शिप्टन और टिलमैन की नहीं थी.
तीनों शेरपा बेहद महत्वपूर्ण थे
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- अंगथार्के: समझदार और रास्ता खोजने में माहिर
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- पासांग: बेहतरीन पर्वतारोही और धार्मिक
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- कुसांग: सबसे मेहनती और ऊर्जावान
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जब बाकी लोग डरकर भाग गए, तब यही लोग साथ रहे. उन्होंने हर मुश्किल में टीम को आगे बढ़ाया.
आज भी वैसा ही रहस्य
1936 में नंदा देवी की चढ़ाई पहली बार पूरी हुई. लेकिन 1983 से इस क्षेत्र को सुरक्षित घोषित कर दिया गया है. आज भी यह जगह आम लोगों के लिए बंद है. घाटी अब भी खतरनाक है. प्रकृति अब भी वैसी ही है लेकिन 1934 की उस शाम, पांच लोग इस रहस्यमयी जगह तक पहुंचे. सिर्फ अपने साहस, मेहनत और विश्वास के दम पर.शिप्टन ने अपनी किताब में लिखा कि यहां उन्हें वह शांति मिली, जो सिर्फ ऊँचे पहाड़ों में खोज करने वालों को मिलती है. कुछ जगहें ऐसी होती हैं, जो अपने रहस्य सिर्फ उन्हीं को दिखाती हैं, जो उन्हें पाने के लिए सच में तैयार होते हैं.





