छत्तीसगढ़

भरतपुर की स्पेशल 60 महिला टीम के हौसलों की उड़ान, पूरे गांव की बदली तकदीर, पलायन पर भी लगा फुलस्टॉप

मनेंद्रगढ़ चिरमिरी भरतपुर: कुछ कर गुजरने का हौसला अगर दिल में है, तो मुश्किलों के लाख तूफान भी आपको डिगा नहीं सकते हैं. कुछ ऐसा ही कर दिखाया है भरतपुर विकासखंड की महिलाओं ने. वनांचल क्षेत्र में एक छोटा सा गांव आज पूरे प्रदेश के लिए मिसाल बनता जा रहा है. यहां कई जगह गौठान योजनाएं वर्तमान में कागजों में सिमट चुकी हैं. लेकिन ग्राम पंचायत धोवताल की महिलाओं ने उसी बंद पड़े गौठान को किराए पर लेकर आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिखनी शुरू कर दी है.

60 स्पेशल महिलाएं बना रहीं गांव को आत्मनिर्भर

भरतपुर की 60 स्पेशल महिलाओं ने अपने भागीरथी प्रयास (निरंतर कोशिशों) से न सिर्फ अपने ग्राम पंचायत धोवताल की तस्वीर बदली बल्कि गांव की पूरी महिलाओं को आत्मनिर्भर बना दिया. धोवताल की महिलाएं आज रोजगार कर भी रही हैं और कइयों को रोजगार दे भी रही हैं. जिन साठ स्पेशल महिलाओं ने अपने गांव और पंचायत की तस्वीर बदली है, उस ग्राम पंचायत के लोग आज भी कुछ जरूरी बुनियादी सुविधाओं से महरूम हैं. बावजूद इसके गांव की महिलाओं ने वो कमाल कर दिखाया, जो विकसित ग्राम पंचायतों में भी देखने को नहीं मिलता.NRLM के माध्यम से हमें आजीविका शुरू करने के लिए प्रेरित किया गया. आज हम गौठान में मुर्गी, सुअर, बटेर पालन के साथ दुकान भी चला रहे हैं. धीरे-धीरे लाभ बढ़ रहा है और महिलाओं को रोजगार मिल रहा है: फूलमती सिंह, समूह अध्यक्ष

भरतपुर विकासखंड के वनांचल इलाके में बसे धोवताल में करीब 150 घर हैं. यहां की कुल आबादी करीब 510 लोगों की है. गांव की ज्यादातर महिलाएं आत्मनिर्भर बन चुकी हैं. गांव की महिलाएं बताती हैं कि उन्होने बंद पड़े गौठानों को किराए पर लेकर उसमें आजीविका के साधन जुटाने शुरू किए. गांव में वर्तमान में चार प्रमुख समूह कार्य कर रही हैं. बकरी पालन का काम बजंरगबली समूह कर रहा है. सुअर पालन का काम लक्ष्मी समूह के जिम्मे है. मछली, बटेर और मुर्गी पालन का काम सिद्धबाबा समूह देख रहा है. दुर्गा समूह किराना और मनिहारी दुकान का काम संभालता है. सबसे अच्छी बात ये है कि इन सभी समूहों की कमान महिलाओं के हाथों में है. इन महिलाओं की बदौलत ग्रामीण अर्थव्यवस्था तेजी से मजबूत होती जा रही है.

इनके बनाए सामान मध्य प्रदेश तक पहुंच रहे

समूह से जुड़ी महिलाएं बताती हैं कि उनको क्लस्टर स्तर पर 60-60 हजार की सहायता मिली, जिसे उन्होंने खर्च नहीं किया बल्कि निवेश कर अपना व्यवसाय खड़ा कर लिया. इन समूहों से जुड़ी महिलाएं अपने उत्पादों को बहरसी, चुटकी जैसे हाट-बाजारों के साथ-साथ मध्य प्रदेश तक बेच रही हैं. गांव की महिलाएं बताती हैं कि काम बढ़ने से गांव से होने वाला पलायन भी रुका और लोग गांव में ही रोजगार तलाशने लगे. गांव के लोग भी बताते हैं कि पहले गांव के लोग काम की तलाश में रायपुर, गुजरात और मेरठ तक जाते थे.मैं काम के लिए रायपुर तक गया लेकिन काम को लेकर मुझे कोई संतुष्टि नहीं मिली. अब गौठान में ही काम शुरू किया है. यहां कई तरह की आजीविका योजनाएं चल रही हैं, जिससे रोजगार भी मिल रहा है और परिवार की गाड़ी भी आराम से चल रही है: उस्मान चेरवा, युवा कार्यकर्त

भरतपुर विकासखंड में 1737 समूह सक्रिय हैं, जिनमें 16 हजार से अधिक महिलाएं कार्यरत हैं. लेकिन धोवताल का मॉडल सबसे सराहनीय है, जहां चार समूह मिलकर विभिन्न आजीविका गतिविधियां संचालित कर रहे हैं और उत्पादों को अन्य क्षेत्रों तक बेच रही हैं: ऋषि कुमार, ए.डी.ई.ओ., जनपद, भरतपुर

मेहनत से बदली तस्वीर और तकदीर

कहते हैं तस्वीर और तकदीर दोनों बदलती है, अगर आप अपने कर्म यानी मेहनत पर यकीन करें. धोवताल की महिलाओं ने खुद को नियति पर नहीं छोड़ा बल्कि अपनी मेहनत से अपनी तकदीर लिखी. गांव की महिलाएं पैसों की मोहताज नहीं हैं, ये महिलाएं अब दूसरों को आर्थिक मदद कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए निकल पड़ी

 

Manoj Mishra

Editor in Chief

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