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मजिस्ट्रेट का न्यायिक काम करना डीएम, एसपी और राजनीतिक मुखिया से ऊपर, उनके आदेशों की अनदेखी करना ‘माफ़ करने लायक नहीं’: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि एक न्यायिक अधिकारी अपना न्यायिक काम करते हुए डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट या डिस्ट्रिक्ट पुलिस चीफ और यहां तक ​​कि किसी राज्य के राजनीतिक मुखिया से भी ऊपर होता है, और उनके आदेश की अनदेखी करना ‘माफ़ करने लायक नहीं’ है।

कोर्ट ने आगे कहा कि न्यायिक अधिकारी द्वारा दिए गए आदेशों की इस तरह अनदेखी न केवल कोर्ट की अवमानना ​​है, बल्कि कानून के अधिकार को सीधी चुनौती है।

जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की बेंच ने ललितपुर में एक चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (CJM) के आदेशों की अनदेखी करने के लिए दोषी पुलिस अधिकारियों को भी कड़ी फटकार लगाई। इस प्रकार, सिंगल जज ने एक स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO) और एक इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर (IO) को कोर्ट उठने तक कोर्टरूम में कस्टडी में रखने की सजा सुनाई।

संक्षेप में मामला

सानू उर्फ ​​राशिद ने जमानत अर्जी दायर की, जो धोखाधड़ी के एक मामले में फंसा है। कहा जाता है कि उन्हें 14 सितंबर, 2025 को बिना किसी ऑफिशियली अरेस्ट के कस्टडी में ले लिया गया।

इसके बाद 16 सितंबर को उनकी बहन ने CJM, ललितपुर के सामने आवेदन दायर किया, जिसमें दावा किया गया कि पुलिस ने उनके भाई को कस्टडी में ले लिया, लेकिन उनकी गिरफ्तारी नहीं दिखाई गई।

उसने उसी दिन अग्रिम जमानत आवेदन भी दिया। हालांकि, 17 सितंबर की सुबह DGC (क्रिमिनल) द्वारा एप्लीकेंट की गिरफ्तारी की जानकारी मिलने पर इसे 18 सितंबर खारिज की गई।

हालांकि, इसे गंभीरता से लेते हुए CJM, ललितपुर ने [22 सितंबर, 30 सितंबर और 3 नवंबर, 2025 को] कई कड़े ऑर्डर दिए, जिसमें संबंधित SHO और IO को कथित गैर-कानूनी हिरासत की तारीखों का पुलिस स्टेशन का CCTV फुटेज पेश करने का निर्देश दिया गया। हालांकि, फुटेज अभी भी पेश नहीं किया गया।

इसके अलावा, CJM ने यह भी पूछा कि एक महिला सह-आरोपी रशीदा को सुबह 4:00 बजे क्यों गिरफ्तार किया गया, जबकि एक महिला को सूरज डूबने के बाद और सूरज उगने से पहले गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।

संबंधित CJM ने अपने आदेश में परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी ज़िक्र किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत में टॉर्चर को रोकने के लिए पुलिस स्टेशनों में CCTV फुटेज लगाने और उन्हें सुरक्षित रखने का आदेश दिया था।

CJM ने अपने आदेशों में पुलिस अधिकारियों को अवमानना ​​की कार्रवाई की चेतावनी भी दी। हालांकि, इन आदेशों के बावजूद, पुलिस अधिकारियों ने न तो रिपोर्ट जमा की और न ही CCTV फुटेज दी।

आखिर में, जब यह मामला 4 फरवरी, 2026 को हाईकोर्ट के सामने आया तो हाईकोर्ट ने संबंधित IO और SHO को तलब किया। दोनों 18 फरवरी को पेश हुए और बिना शर्त माफी मांगी।

उन्होंने आगे दावा किया कि CCTV की स्टोरेज कैपेसिटी सिर्फ़ 10 टेराबाइट थी, जिसका मतलब है कि फुटेज दो महीने बाद अपने आप डिलीट हो गई। उन्होंने यह भी माना कि CJM के ऑर्डर न मानना ​​’गलती’ की वजह से हुआ।

हालांकि, जस्टिस देशवाल ने इस सफाई को मानने से इनकार किया और कहा कि SHO और IO ने जानबूझकर CJM के ऑर्डर नहीं माने। सिंगल जज ने आगे कहा कि कोर्ट न्यायिक ऑर्डर न मानने पर अपनी आँखें बंद नहीं कर सकता।

उन्होंने इस तरह कहा:

 

यहां सवाल सिर्फ़ भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 में दी गई किसी व्यक्ति की पर्सनल लिबर्टी के उल्लंघन का नहीं है, बल्कि ज्यूडिशियल अधिकारियों के ऑर्डर की अनदेखी का भी है, जिसका असर कानून की अथॉरिटी को नीचा दिखाने का होता है।”

खास बात यह है कि कोर्ट ने अपने ऑर्डर में यह भी कहा कि यूपी के कई पुलिस स्टेशनों में CCTV कैमरों का ठीक से मेंटेनेंस न करना एक “रूटीन फीचर” बन गया, जिससे पुलिस द्वारा गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में लिए गए लोगों की पर्सनल लिबर्टी पर गंभीर असर पड़ रहा है।

इसके अलावा, ऑल इंडिया जजेज एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का ज़िक्र करते हुए हाईकोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि जजों की तुलना एडमिनिस्ट्रेटिव और एग्जीक्यूटिव अधिकारियों से नहीं की जा सकती, क्योंकि वे सॉवरेन स्टेट के काम करते हैं और उनकी तुलना सेक्रेटेरियल स्टाफ या एडमिनिस्ट्रेटिव अधिकारियों से नहीं की जा सकती, जो सिर्फ़ पॉलिटिकल एग्जीक्यूटिव के फ़ैसले लेते हैं।

हाईकोर्ट ने कहा,

“जब एक ज्यूडिशियल ऑफिसर (जूनियर डिवीज़न का ज्यूडिशियल ऑफिसर हो सकता है) अपना ज्यूडिशियल काम कर रहा होता है तो वह डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट या डिस्ट्रिक्ट पुलिस चीफ और यहां तक कि किसी राज्य के पॉलिटिकल हेड से भी ऊपर होता है।”

इसमें यह भी कहा गया कि कोर्टरूम में आने वाले किसी भी व्यक्ति को ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट की कुर्सी का सम्मान करना चाहिए। चूंकि डिस्ट्रिक्ट ज्यूडिशियल ऑफिसर राहत चाहने वाले आम व्यक्ति के लिए पहली सुरक्षा लाइन होते हैं, इसलिए वे ज्यूडिशियरी की रीढ़ होते हैं।

इसलिए कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट्स एक्ट, 1971 की धारा 10 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए हाईकोर्ट ने IO और SHO दोनों को CJM के आदेशों का जानबूझकर पालन न करने के लिए कंटेम्प्ट का दोषी पाया।

हालांकि, सज़ा की मात्रा पर नरम रुख अपनाते हुए कोर्ट ने उन्हें शाम 4:00 बजे कोर्ट के उठने तक कोर्ट रूम में कस्टडी में रहने की सज़ा सुनाई।

अपने आदेश में बेंच ने यह भी कहा कि, क्योंकि आवेदक को उसके परिवार को बताए बिना तीन दिनों तक गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया, यह डीके बसु मामले में सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का सीधा उल्लंघन है।

इसलिए उसने राज्य सरकार को आवेदक को 1 लाख रुपये मुआवज़े के तौर पर देने का निर्देश दिया। हालांकि, राज्य को यह रकम ज़िम्मेदार पुलिस कर्मचारियों की सैलरी से वसूलने की आज़ादी दी गई।

उल्लेखनीय है कि हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि सभी ज़िलों के CJM, या संबंधित मजिस्ट्रेट, अपनी ऑफिशियल ड्यूटी के तहत कोर्ट के समय के बाद अपने-अपने अधिकार क्षेत्र के पुलिस स्टेशनों में CCTV कैमरों के काम करने के बारे में रैंडम तरीके से चेक करेंगे और इसकी पहले से जानकारी अपने डिस्ट्रिक्ट जज को देंगे।

बेंच ने आगे कहा कि अगर CJM या ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट यह वेरिफाई करने के लिए संबंधित पुलिस स्टेशन का CCTV कैमरा चेक करने के लिए इंस्पेक्शन करते हैं कि परमवीर सिंह सैनी (सुप्रा) मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन किया गया है या नहीं तो इसे उनकी ऑफिशियल ड्यूटी का हिस्सा माना जाएगा।

कोर्ट ने आगे कहा कि इस इंस्पेक्शन के दौरान, सभी पुलिस अधिकारी उनके साथ सहयोग करेंगे। साथ ही किसी भी ज्यूडिशियल अधिकारी के साथ किसी भी तरह की रुकावट या बेइज्ज़ती से सख्ती से निपटा जाएगा।

कोर्ट ने साफ किया कि ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट या CJM द्वारा पुलिस स्टेशनों का CCTV कैमरों के काम करने के तरीके की जांच करना, उनकी ऑफिशियल ड्यूटी के तहत परमवीर सिंह सैनी (सुप्रा) मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन है। खास बात यह है कि कोर्ट ने यह भी साफ किया कि हर जिले में ह्यूमन राइट्स कोर्ट ह्यूमन राइट्स के उल्लंघन से जुड़ी शिकायत पर सुनवाई कर सकता है, जिसमें पुलिस द्वारा गैर-कानूनी हिरासत या पुलिस स्टेशन में हिरासत में हिंसा भी शामिल है और कानून के मुताबिक कार्रवाई कर सकता है।

आवेदक को आखिरकार हाईकोर्ट ने इस बात पर ज़मानत दी कि वह 15 दिनों के अंदर पहली सूचना देने वाली की फाइनेंस कंपनी को 15 लाख रुपये ट्रांसफर करेगा।

Manoj Mishra

Editor in Chief

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