पश्चिम चम्पारण. बिहार के एक छोटे से भू-भाग पर उपजने वाला मर्चा धान आज दुनिया के कई देशों में अपनी पहचान बना चुका है. बेहद खास और अनोखे अरोमा से भरपूर यह धान उस वक्त अंतरराष्ट्रीय पहचान पाता है, जब इसे कूटकर चिउड़ा बनाया जाता है. जी हां, यह वही चिउड़ा है जिसे मर्चा धान के नाम से जाना जाता है. वर्ष 2023 में इसे GI टैग से नवाजा गया. मर्चा धान की खेती करने वाले किसान बताते हैं कि यह ऐसी फसल है, जिसकी पैदावार पूरी दुनिया में सिर्फ बिहार के पश्चिम चम्पारण जिले के छह प्रखंडों में ही संभव है.
इन प्रखंडों में ही संभव है मर्चा धान की खेती
मर्चा धान की खेती करने वाले नरकटियागंज स्थित साठी के किसान आनंद कुमार सिंह बताते हैं कि हालांकि मर्चा धान को जिले के अन्य हिस्सों में लगाने की कोशिश की गई, लेकिन उपज के बाद धान में अरोमा का नामोनिशान तक नहीं था. ऐसे में वैज्ञानिकों ने साफ कर दिया कि खास अरोमा वाले मर्चा धान की खेती जिले के सिर्फ छह प्रखंडों चनपटिया, लॉरिया, नरकटियागंज, मैनाटॉड, गौनाहा और रामनगर में ही संभव है. बस यही वह समय था, जब इसे GI टैग की सूची में शामिल कराने की तैयारी शुरू हुई.
दो साल में तीन गुना बढ़ी कीमत
आनंद कुमार सिंह के अनुसार, GI टैग मिलने से पहले मर्चा धान चिउड़ा की कीमत सिर्फ 40 से 50 रुपये प्रति किलो थी. उस समय भी इसके स्वाद का क्रेज लोगों में खूब था और किसान इसे दुबई और अमेरिका जैसे कई देशों तक भेजते थे. लेकिन वर्ष 2023 में GI टैग मिलने के बाद इसकी कीमत में करीब तीन गुना बढ़ोतरी हुई और वर्तमान में यह 150 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है.
कृषि विभाग से मिले आंकड़ों के अनुसार, GI टैग से पहले इसकी खेती जिले के करीब 700 एकड़ क्षेत्र में होती थी, जो टैग मिलने के बाद कई गुना बढ़ गई. वर्ष 2025 में 2000 से अधिक किसानों ने करीब 1000 एकड़ में मर्चा धान की खेती की है.
अनोखे अरोमा से भरपूर और आसानी से पचने वाला
मर्चा धान की खेती करने वाले अन्य किसान बताते हैं कि वर्तमान समय में बाजार में मर्चा धान चिउड़ा की मांग काफी ज्यादा है. बीते दो वर्षों में इसकी खेती का रकबा करीब 300 एकड़ तक बढ़ा है और यह लगातार बढ़ रहा है.बासमती से भी खास अरोमा और आसानी से पचने के कारण लोग इसे उपहार के रूप में एक-दूसरे को देते हैं. इसी तरह यह चिउड़ा बिहार के एक छोटे से गांव से निकलकर भारत सहित दुनिया के कई देशों तक पहुंच रहा है.





