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अजित पवार के विमान हादसे को क्या टाला जा सकता था, आख़िर के 11 मिनट क्यों होते हैं इतने अहम?

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार के निधन के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या इस विमान हादसे को टाला जा सकता था?

कहा जा रहा है कि अगर बारामती रनवे पर कुछ और सुविधाएं होतीं तो कम विज़िबिलिटी में भी सुरक्षित लैंडिंग होने की संभावना बन सकती थी.

बारामती हवाई पट्टी

अजित पवार बारामती की हवाई पट्टी को विकसित करना चाहते थे. इसके लिए वह कुछ बैठक भी कर चुके थे.

अगस्त 2025 तक हवाई पट्टी का मैनेजमेंट अनिल अंबानी के स्वामित्व वाली रिलायंस एयरपोर्ट डेवलपर्स देख रही थी. बारामती हवाई अड्डे के प्रभारी एमएडीसी प्रबंधक शिवाजी तावड़े ने कहा, हमने 19 अगस्त को हवाई अड्डे का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया था क्योंकि इसके प्रबंधन में कई ख़ामियां थीं.”

रिपोर्ट में बताया गया है, “पिछले कुछ महीनों में अजित पवार ने ख़ुद इस हवाई अड्डे को अपग्रेड करने के लिए कई बैठकें की थीं. उन्होंने पीएपीआई, नाइट लैंडिंग और नियमित एटीसी जैसी बुनियादी सुविधाओं की मांग की थी.”

रिटायर्ड पायलट एहसान ख़ालिद ने बीबीसी हिन्दी को बताया, “बारामती में एयर ट्रैफ़िक कंट्रोल की सही व्यवस्था का नहीं होना चौंकाता है. एक सर्टिफ़ाइड कंट्रोलर ही यह ठीक से बता सकता है कि ज़मीन पर विज़िबिलिटी कैसी है.”

अगर कोई अनुभवी कंट्रोलर तैनात नहीं है तो पायलट अपनी विज़िबिलिटी के आधार पर ही लैंडिंग की कोशिश करता है. जिस समय हादसा हुआ, उस टाइम पायलट की आंखों पर धूप भी पड़ रही होगी, इस दौरान यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि प्लेन सही डायरेक्शन में है या नहीं.”

वह कहते हैं कि विज़ुअल अप्रोच का कोई सिस्टम न होने पर पायलट खुद विज़िबिलिटी का अंदाज़ा लगाता है तो ख़तरा चार गुना अधिक होता है.

हवाई पट्टी रेड बर्ड फ़्लाइंग स्कूल और कार्वर एविएशन को किराए पर दी गई है, जहां फ़्लाइंग ट्रेनिंग दी जाती है. इसे ‘अनकंट्रोल्ड एयरोड्रम’ कहा जाता है, क्योंकि यहां सामान्य एयरपोर्ट जैसी सुविधाएं नहीं हैं- जैसे एयर ट्रैफ़िक कंट्रोल (एटीसी), इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम, सुरक्षा व्यवस्था या आग बुझाने की टीम. यहां कोई मौसम विशेषज्ञ नहीं है और न ही नेविगेशन के लिए अच्छे उपकरण हैं, जो पायलटों को जानकारी दे सकें.”

बारामती की हवाई पट्टी पर ट्रेनिंग ले चुके एक पायलट ने द हिंदू को बताया कि पायलट को सिर्फ़ अपनी आंखों पर भरोसा करना पड़ता है क्योंकि कॉकपिट में कोई नेविगेशन की मदद नहीं मिलती. यह हवाई पट्टी एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के एटीसी कवरेज क्षेत्र से बाहर है. इसलिए एटीसी की मदद फ़्लाइट ट्रेनिंग स्कूल के स्टाफ़ से ही मिलती है, जिसके पास बहुत बेसिक सुविधाएं हैं.

हवाई पट्टी पर जिन सुविधाओं की थी कमी

रिटायर्ड पायलट एहसान ख़ालिद कहते हैं कि बारामती हवाई पट्टी का रनवे भले छोटा है, लेकिन यह लियरजेट 45 जैसे प्लेन के लिए ठीक है.

उन्होंने कहा, “मुझे नहीं लगता कि रनवे की वजह से क्रैश हुआ क्योंकि हादसा रनवे से पहले या बाहर हुआ. अगर रनवे पर इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम (आईएलएस), वीओआर और जीपीएस जैसे सिस्टम होते, जो कम विज़िबिलिटी के दौरान भी पायलट को गाइड करते हैं, तो यह क्रैश टल सकता था. इनके होने से क्रैश होने की आशंका 75 से 80% तक कम हो जाती.”

इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम (आईएलएस) ज़मीन पर लगा हुआ रेडियो सिस्टम है, जो हवाई जहाज़ को रनवे पर सही-सही और सुरक्षित तरीके से उतरने में मदद करता है.

ख़ासकर जब बहुत धुंध, भारी बारिश, ज़्यादा बादल, अंधेरा या अन्य किसी कारण से विज़िबिलिटी कम हो. आईएलएस ही गाइड करता है कि हवाई जहाज़ रनवे के बिल्कुल बीचों-बीच हो, जब नीचे आए तो सही स्पीड और सही एंगल हो.

फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन पायलट्स के फ़ाउंडर प्रेजिडेंट कैप्टन एमआर वाडिया ने कहा, “बारामती की हवाई पट्टी पूर्ण रूप से विकसित एयरपोर्ट नहीं थी, यहां पर केवल दो ट्रेनिंग स्कूल्स चलते हैं. आईएलएस ठीक-ठाक विकसित एयरपोर्ट्स पर होते हैं, इसलिए यहां पर आईएलएस नहीं था. बारामती में एयरपोर्ट एटीसी अथॉरिटी भी नहीं थी.”

एहसान ख़ालिद भी इस बात से सहमत हैं कि बारामती जैसी छोटी हवाई पट्टी पर आईएलएस नहीं हो सकता लेकिन वह इसका विकल्प भी बताते हैं.

उनका कहना है, “आजकल पूरी दुनिया में सैटलाइट के ज़रिये जीपीएस के आधार पर प्लेन संचालित होते हैं. अगर जीपीएस हो तो ज़मीनी उपकरणों की ज़रूरत भी नहीं होती है.”

”अफ़्रीका में भी जीपीएस से जानकारी प्राप्त कर लैंडिंग होती है. आईएलएस के लिए आपको पैसों और ज़मीन की ज़रूरत होती है जबकि जीपीएस बेस्ड सिस्टम अफ़ोर्डेबल होता है.”

लैंडिंग टाइम बहुत अहम

किसी भी विमान के लिए 11 मिनट बहुत अहम होते हैं. इसमें से तीन मिनट टेकऑफ़ के समय के और आठ मिनट लैंडिंग के वक़्त वाले. इसे ‘क्रिटिकल 11 मिनट्स’ कहा जाता है.

अन्य देशों में भी इन क्रिटिकल 11 मिनट्स का विशेष तौर पर ख़्याल रखा जाता है.

इन 11 मिनटों के दौरान केबिन क्रू (फ़्लाइट अटेंडेंट) को कॉकपिट (पायलटों) से बात करने की मनाही होती है.

पायलटों को भी सिर्फ़ प्लेन को कंट्रोल करने का काम करना होता है, कोई और काम नहीं (जैसे चैटिंग या कुछ और).

ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि कमर्शियल हवाई जहाज़ों के 80% हादसे इन्हीं दो टाइमफ़्रेम में होते हैं. इस दौरान प्लेन सबसे ज़्यादा ख़तरे में होता है. टेकऑफ़ और लैंडिंग के वक़्त कई तरह की मुश्किलें आ सकती हैं.

इनसे पता चलता है कि सभी विमानन दुर्घटनाओं में से आधे से अधिक क़रीब 53% लैंडिंग के दौरान हुईं. टेकऑफ़ के बाद 8.5% दुर्घटनाएं हुईं. इससे स्पष्ट है कि लैंडिंग के दौरान पायलट को विशेष सावधानियां बरतनी पड़ती हैं.

लैंडिंग करते वक़्त ज़्यादा हादसे क्यों होते हैं, इसके जवाब में रिटायर्ड पायलट ख़ालिद हुसैन ने ख़राब मौसम को ज़िम्मेदार बताया क्योंकि विज़िबिलिटी स्पष्ट नहीं होती है.

उन्होंने एक उदाहरण देते हुए समझाया, “जैसे एक पक्षी उड़ता है, ठीक वैसे ही प्लेन भी उड़ान भरता है. उड़ान भरते हुए इसका ध्यान रखना होता है कि कहीं टकरा न जाएं या कोई दिक़्क़त न आ जाए.”

”जब आसमान में प्लेन हज़ारों फुट ऊपर रहता है तो हादसा होने की आशंका बहुत कम होती है. लेकिन जैसे ही लैंडिंग होने लगती है तो आपको ध्यान रखना होता है कि एयरपोर्ट कहाँ है, रनवे कहाँ है और कहीं कोई अड़चन तो नहीं.”

कैप्टन एमआर वाडिया ने कहा कि फ़िलहाल हमें जांच रिपोर्ट आने का इंतज़ार करना चाहिए.

कई चीज़ें ऐसी हैं, जिन्हें समझना ज़रूरी है. विज़िबिलिटी 3000 मीटर बताई जा रही है, जो कुछ ख़ास ख़राब नहीं है.

पायलट को पहले रनवे नहीं दिखा, फिर दिख गया और फिर वह लैंडिंग नहीं करवा पाया. इन सवालों के जवाब अभी नहीं हैं, जो इस हादसे की वजह को सही तरीक़े से बता सकते हैं.

Manoj Mishra

Editor in Chief

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