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मध्य प्रदेश से आए बाघों ने बढ़ाई छत्तीसगढ़ की बाघ आबादी

मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व में साल 2018 में एक युवा बाघिन कैमरा ट्रैप में दिखना बंद हो गई। इस बाघिन का इस निगरानी से अचानक गायब हो जाना थोड़ा अजीब था। न तो इसके शव के मिलने या अवैध शिकार की कोई घटना दर्ज की गई थी और न इसके किसी अन्य बाघ या जानवर से टकराव की कोई आधिकारिक रिपोर्ट मिली थी। इससे पता चलता था कि उसकी मौत टाइगर रिज़र्व के अंदर नहीं हुई थी।

हालाँकि, लगभग तीन साल तक मध्य प्रदेश के आधिकारिक मॉनिटरिंग ग्रिड में इस बाघिन की उपस्थिति का कोई भी सबूत या तस्वीर नहीं मिली।

फिर, 2021 में पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ के अचानकमार टाइगर रिज़र्व (एटीआर) में लगे कैमरा ट्रैप में एक बाघिन को शावकों के साथ साल के जंगल से गुज़रते हुए देखा गया। धारियों के पैटर्न की जाँच से यह पुष्टि हुई कि यह बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व से गायब हुई वही बाघिन थी। इसने मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ आने में लगभग 400 किलोमीटर का सफ़र तय किया। बाद में वन अधिकारियों ने इसका नाम ‘झुमरी’ रखा और आधिकारिक मॉनिटरिंग रिकॉर्ड में इसे टीके-8 के तौर पर दर्ज किया गया।

जानकारों का कहना है कि जब झुमरी बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व से गायब हुई, तो वह ‘डिस्पर्सल एज’ (बिखराव की उम्र) में पहुँच चुकी थी। यह बाघ के जीवन का वह दौर होता है, आमतौर पर दो से तीन साल की उम्र, जब उनके लिए अपने जन्म वाले इलाके में बने रहना मुमकिन नहीं रह जाता।

  भारत के सबसे ज़्यादा बाघों वाले रिज़र्व में से एक है। ऐसी जगहों पर, पारिस्थितिकी सफलता से दबाव बनता है। जब शिकार की संख्या ज़्यादा होती है और प्रजनन करने वाली मादा बेहतर रूप से स्थापित हो जाती हैं, और शावकों के जीवित रहने की संभावना बढ़ जाती है। लेकिन इलाका सीमित होता है। वयस्क नर बाघों के अपने तय इलाके होते हैं जो वहाँ रहने वाली मादाओं के इलाकों से मिलते-जुलते या ओवरलैप करते हैं। वाइल्डलाइफ़ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया (डब्ल्यूटीआई) में कंजर्वेशन हेड समीर कुमार सिन्हा ने बताया कि जब युवा बाघ (सब-एडल्ट) स्वतंत्र हो जाते हैं, तो उन्हें धीरे-धीरे बाहर की ओर धकेल दिया जाता है।

बाघों के ऐसे दूर तक चले जाने के मामले में झुमरी कोई अकेली मिसाल नहीं है।

साल 2023 की शुरुआत में, एक और घटना ने इस पैटर्न को और मज़बूत किया। मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिज़र्व में T-200 नाम के एक युवा नर बाघ को देखा गया था। बाद में वह कान्हा के मॉनिटरिंग ग्रिड से गायब हो गया। फिर उसी साल दिसंबर में, एटीआर में कैमरा ट्रैप ने एक नए नर बाघ को रिकॉर्ड किया। धारियों के विश्लेषण से इस बाघ के T-200 होने की पुष्टि हुई।

इन गतिविधियों की वजह से एटीआर और छत्तीसगढ़ में बाघों की संख्या बढ़ रही है।

डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया में सेंट्रल इंडिया लैंडस्केप के डायरेक्टर संकेत भाले ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि 2010 से हर चार साल में होने वाले ‘ऑल इंडिया टाइगर एस्टिमेशन’ (AITE) सर्वे में एटीआर में बाघों की मौजूदगी धीरे-धीरे बढ़ती देखी गई है। एटीआर में 2010, 2014 और 2018 में क्रमशः एक, तीन और पांच बाघ दर्ज किए गए थे। अब इस रिज़र्व में सात मादा और तीन नर बाघ हैं, और आस-पास के रिज़र्व से भी बाघों का आना-जाना लगा रहता है।

हाल की निगरानी से पता चलता है कि अभी इस रिज़र्व में लगभग 10 बाघ हैं, जिनमें कई प्रजनन करने वाली मादाएं भी शामिल हैं।

छत्तीसगढ़ में बाघों की कुल संख्या, जो कभी घट गई थी, हाल के वर्षों में बढ़ने लगी है; यह संख्या 2022 में 17 से बढ़कर अप्रैल 2025 में दोगुनी होकर 35 हो गई है। राज्य के अधिकारी इसका श्रेय अवैध शिकार रोकने के कड़े उपायों, कैमरा-ट्रैप से निगरानी के दायरे को बढ़ाने, आवास प्रबंधन और वन गलियारों (फॉरेस्ट कॉरिडोर) को बनाए रखने पर नए सिरे से दिए गए ध्यान को देते हैं।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि उनकी सरकार ने पिछले कुछ सालों में बाघों के लिए अनुकूल माहौल बनाने की कोशिशें की हैं।

मोंगाबे-इंडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, “एटीआर के जंगलों में बाघों की आबादी जिस तरह से बढ़ी है, उससे पता चलता है कि बाघ अब यहाँ अच्छी तरह फल-फूल रहे हैं। पड़ोसी राज्यों से आए बाघों ने भी यहाँ अपने इलाके स्थायी रूप से बना लिए हैं। हमारे प्रशासन ने वन अधिकारियों, स्थानीय समुदायों और वन्यजीव संगठनों के साथ मिलकर आवास की सुरक्षा बढ़ाने, अवैध शिकार रोकने के उपायों को मजबूत करने और जंगलों के बीच संपर्क बनाए रखने के लिए काम किया है। इन समन्वित प्रयासों ने एटीआर को बाघों के लिए एक आकर्षक घर बना दिया है, जिससे यहाँ रहने वाले और बाहर से आने वाले बाघों को बसने, प्रजनन करने और आबादी को लगातार बढ़ाने में मदद मिली है।”

सिन्हा ने कहा कि किसी नई जगह पर जाकर बसने वाले बाघ के लिए तीन बातें मायने रखती हैं: शिकार की उपलब्धता, सुरक्षा और साथी की मौजूदगी।

उन्होंने कहा, “अगर एटीआर में बांधवगढ़ और कान्हा से आए बाघ प्रजनन कर रहे हैं, तो यह जंगल के हालात में सुधार का संकेत है।”

घने जंगल, बाघों की कम आबादी

नवंबर 2000 में छत्तीसगढ़ के नए राज्य बनने के समय राज्य का वनक्षेत्र लगभग 44% था। ये जंगल ‘   ‘ का हिस्सा हैं, जो दुनिया में बाघों के संरक्षण के लिए सबसे महत्वपूर्ण इलाकों में से एक है।

इस नए राज्य को बाघों के लिए संभावित जगहें मिलीं, जैसे दक्षिण में इंद्रावती टाइगर रिज़र्व, उत्तर में एटीआर और उदंती-सीतानदी वाइल्डलाइफ़ सैंक्चुअरी। बाद में इन तीनों संरक्षित क्षेत्रों को टाइगर रिज़र्व घोषित किया गया। साल 2021 में, गुरु घासीदास-तमोर पिंगला टाइगर रिज़र्व को नोटिफ़ाई किया गया जो मध्य प्रदेश के संजय-डुबरी लैंडस्केप की तरफ की इकोलॉजिकल लिंक को मज़बूत करता है।

हालाँकि, जब बाघों की संख्या की बात आती है, तो छत्तीसगढ़ की कहानी मध्य प्रदेश जितनी सफल नहीं रही है।

साल 2006 में छत्तीसगढ़ में 26 बाघ   किए गए थे। साल 2014 तक यह संख्या 46 थी, लेकिन 2018 के ‘ऑल-इंडिया टाइगर एस्टीमेशन’ में सिर्फ 19 बाघ   किए गए।

इसी दौरान मध्य प्रदेश में लगातार बढ़ोतरी देखी गई। 2006 में लगभग 300 बाघों की संख्या बढ़कर 2018 में 526 हो गई और 2022 के राष्ट्रीय अनुमान में यह संख्या 785 तक पहुँच गई, जो भारत में सबसे ज़्यादा है।

संरक्षणवादी और अविभाजित मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के वन्यजीव बोर्ड के पूर्व सदस्य प्राण चड्ढा ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि कागज़ पर, छत्तीसगढ़ में बाघों के बने रहने के लिए ज़रूरी कई संरचनात्मक चीज़ें मौजूद थीं, जैसे जंगल का दायरा, शिकार की उपलब्धता, नदियों का तंत्र, ज़मीन की विविधता और कान्हा और बांधवगढ़ जैसी मज़बूत आबादी वाले इलाकों से नज़दीकी। फिर भी, आबादी के रुझान कुछ और ही कहानी बयां करते थे।

छत्तीसगढ़ में जंगल खत्म नहीं हुए थे, लेकिन उनमें प्रजनन करने वाली आबादी की स्थिरता को बनाए रखने की क्षमता कम हो गई थी। सिन्हा ने बताया कि संरक्षण वैज्ञानिकों ने राज्य के कुछ हिस्सों को डेमोग्राफिक “सिंक” के रूप में परिभाषित करना शुरू कर दिया था। यह ऐसा इलाका होता है जहाँ किसी प्रजाति के जानवरों की मौत और उसकी आबादी की अस्थिरता के कारण लगातार प्रजनन नहीं हो पाता और वहां आबादी की स्थिरता आस-पास के बाहरी इलाकों से आने वाली आबादी पर निर्भर करती है।

इस दौरान राज्य में संरक्षित रिज़र्व तो सुरक्षित रहे, लेकिन उनके बीच के कॉरिडोर या गलिआरे सिकुड़ने लगे। कोरबा, रायगढ़, सरगुजा, कोरिया और सूरजपुर जैसे जंगलों वाले ज़िलों में खनन के विस्तार से रिज़र्व के इलाकों पर दबाव बढ़ गया। सड़कों, रेल्वे लाइनों और ट्रांसमिशन कॉरिडोर जैसी परियोजनाओं की वजह से पहाड़ी जंगलों के काटे जाने के कारण इलाके के कॉरिडोर की निरंतरता टूट गई। खेती के विस्तार से रिज़र्व की सीमाओं के आस-पास ‘एज इफ़ेक्ट’ (किनारों पर पड़ने वाला असर) बढ़ गया।

मध्य प्रदेश के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) सुभरंजन सेन ने मोंगाबे-इंडिया को बताया कि छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों में शिकार की उपलब्धता सीमित है, जिससे वन्यजीवों की आबादी का बने रहना मुश्किल हो जाता है।

राजनीती से परे, पारिस्थितिकी का जुड़ाव

जब नवंबर 2000 में छत्तीसगढ़ को मध्य प्रदेश से अलग किया गया, तो इकोलॉजिकल सिस्टम उस लाइन के हिसाब से खुद को रीऑर्गेनाइज़ नहीं कर पाया। उदाहरण के लिए, उत्तरी सीमा के साथ मैकाल हिल्स मध्य प्रदेश के फॉरेस्ट बेल्ट में मिल गईं।

बड़े मांसाहारी जानवरों के संरक्षण में, कनेक्टिविटी सिर्फ़ कहने की बात नहीं है। यह बायोलॉजिकल है।

चड्ढा ने समझाया कि मध्य भारत एक मेटापॉपुलेशन प्रणाली के रूप में कार्य करता है — उप-आबादियों का एक नेटवर्क जो फैलाव के माध्यम से जुड़ा हुआ है। ऐसी प्रणालियों में, कुछ अभयारण्य स्रोत के रूप में कार्य करते हैं, जहां शिकार की उच्च घनत्व और सफल प्रजनन के कारण ज़्यादा बाघ पैदा होते हैं। अन्य अभयारण्य सिंक के रूप में कार्य करते हैं, जहां केवल स्थानीय प्रजनन, मृत्यु दर की भरपाई नहीं कर सकता। उन्होंने आगे कहा, “फैलाव के बिना, अलग-थलग बाघ आबादी में आनुवंशिक विविधता कम हो जाती है। अंतःप्रजनन अवसाद से सफल प्रजनन में कमी और शावकों की मृत्यु दर में वृद्धि का खतरा बढ़ जाता है। छोटी आबादी आकस्मिक घटनाओं, बीमारियों के प्रकोप, शिकार की कमी या अवैध शिकार की घटनाओं के प्रति संवेदनशील हो जाती है।”

कान्हा, बांधवगढ़, संजय-डुबरी, गुरु घासीदास, अचानकमार, इंद्रावती, उदंती-सीतानदी, नागज़िरा, ताडोबा और पलामू को जोड़ने वाले  , मध्य भारत के उस बड़े इलाके का हिस्सा हैं जो हज़ारों वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इस ज़मीन का ज़्यादातर हिस्सा आधिकारिक तौर पर सुरक्षित सीमाओं के बाहर आता है। इसका भविष्य ज़मीन के इस्तेमाल से जुड़े उन फ़ैसलों पर निर्भर करता है जो वन्यजीव नीति के दायरे से कहीं आगे जाते हैं।

मध्य भारत के इलाकों में हुई   से पता चलता है कि बाघ अक्सर जंगल वाली पहाड़ियों की चोटियों और नदियों के किनारे की पट्टियों के सहारे एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं। अगर दखलंदाज़ी एक तय सीमा से कम हो, तो काफ़ी संकरे ‘कैनोपी कॉरिडोर’ (पेड़ों की छतरी वाले रास्ते) भी काम आ सकते हैं। डब्ल्यूटीआई  के सिन्हा ने कहा कि असल बात ‘परमीबिलिटी’ (यानी किसी इलाके से होकर गुज़रने या आवाजाही की क्षमता) है, न कि उसका कानूनी दर्जा।

नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (एनटीसीए) की 2014 की एक   में इस इलाके में वाइल्डलाइफ कॉरिडोर पर असर डालने वाली कई रुकावटों का ज़िक्र किया गया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि कान्हा-पेंच और बांधवगढ़-संजय-डुबरी कॉरिडोर ऐसे इलाकों से गुज़रते हैं जहाँ पहले से ही शिकार का दबाव रहा है और कोयला खनन से जुड़ा निर्माण बढ़ रहा है। बांधवगढ़ को संजय-डुबरी और गुरु घासीदास के मुख्य हैबिटैट से जोड़ने वाले कॉरिडोर को भी खनन से जुड़े लीनियर इंफ्रास्ट्रक्चर से खतरा है। कान्हा-अचानकमार कॉरिडोर के बीच के कुछ जंगलों का इस्तेमाल कमर्शियल फॉरेस्ट्री के लिए किया जाता है। रिपोर्ट में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि ऐसी गतिविधियों को सावधानी से मैनेज किया जाना चाहिए ताकि वाइल्डलाइफ के आने-जाने के रास्ते के तौर पर कॉरिडोर के काम में कोई रुकावट न आए।

इसकी 2022 की रिपोर्ट में फिर से  गई है। इसमें कहा गया है, “हालांकि कुछ ऐसे हैबिटैट कॉरिडोर मौजूद हैं जिनसे बाघों की आवाजाही हो सकती है, लेकिन इनमें से ज़्यादातर हैबिटैट सुरक्षित इलाके नहीं हैं। इंसानों के गैर-ज़रूरी इस्तेमाल और विकास परियोजनाओं की वजह से ये लगातार खराब हो रहे हैं, और इस वजह से जानवरों की आवाजाही के लिए अनुकूल नहीं रह गए हैं।”

टुकड़ों में बंटने से नए तरह के दबाव भी पैदा होते हैं। जंगल के किनारों पर मवेशियों का चरना, इंसानी गतिविधियां, शोर, कृत्रिम रोशनी और सड़कें दिखाई देने लगती हैं। मध्य प्रदेश के पीसीसीएफ, सेन ने कहा कि जंगल में आने वाली हर रुकावट जानवरों के लिए इलाके में घूमना मुश्किल और जोखिम भरा बना देती है।

झुमरी की आवाजाही से पता चला कि बांधवगढ़ और अचानकमार के बीच जानवरों के आने-जाने का कम से कम एक रास्ता चालू था।

सिर्फ़ उसके आने से ही सुधार का पता नहीं चलता, लेकिन सफल प्रजनन से इसका पता चलता है। वन अधिकारियों के अनुसार, एटीआर में उसके पहले शावकों (लिटर) में से एक की मौत हो गई। बताया जाता है कि एक नर बाघ ने उस शावक को मार डाला था।

लेकिन उसने फिर से शावक पैदा किए। 2023 में, उसने सफलतापूर्वक दो शावकों को पाला-पोसा। इसके बाद, उसने चार और शावकों को जन्म दिया।

इसी तरह, T-200 ने कान्हा टाइगर रिज़र्व से अचानकमार तक का सफ़र तय किया, जो लगभग 400-450 किलोमीटर की यात्रा थी। इस आवाजाही से पता चला कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के बीच जुड़ाव बना हुआ है। चड्ढा ने कहा कि यह रास्ता भले ही संकरा हो गया है, लेकिन जैविक रूप से यह अभी भी काम का है।

छत्तीसगढ़ में बाघों की घटती संख्या में हाल के वर्षों में उसमें सुधार के संकेत मिले हैं। राज्य के मुख्यमंत्री ने इसका श्रेय अवैध शिकार रोकने के कड़े उपायों, कैमरा-ट्रैप से निगरानी के विस्तार, आवास प्रबंधन और कॉरिडोर (गलियारे) की सुरक्षा पर नए सिरे से ध्यान देने को दिया है। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ़ इंडिया की रिपोर्टों में भी वन क्षेत्र में धीरे-धीरे बढ़ोतरी के संकेत मिले हैं।

उन्होंने बाघों की संख्या में बढ़ोतरी का श्रेय अपनी सरकार के संरक्षण प्रयासों को दिया। उन्होंने कहा, “न केवल बाघों की संख्या बढ़ी है, बल्कि ‘फॉरेस्ट सर्वे ऑफ़ इंडिया’ के आंकड़ों से छत्तीसगढ़ में वन क्षेत्र में भी वृद्धि का पता चलता है।”

हालांकि, सुभरंजन सेन ने कहा कि कॉरिडोर की सुरक्षा बहुत ज़रूरी है। उन्होंने कहा, “कॉरिडोर प्राकृतिक होते हैं, लेकिन जहाँ इंसानों की मौजूदगी ज़्यादा होती है, वहाँ बाघों का ज़िंदा रहना मुश्किल हो जाता है, और प्रजनन करने वाले बाघों के लिए तो यह चुनौती और भी बड़ी होती है। छत्तीसगढ़ को जंगल के मैनेजमेंट पर और काम करने की ज़रूरत है।”

बांधवगढ़ से एटीआर तक झुमरी का सफ़र वाइल्डलाइफ़ कॉरिडोर की अहमियत को दिखाता है। छत्तीसगढ़ में बाघों की बढ़ती आबादी में उसकी भूमिका एक बड़ी सच्चाई को उजागर करती है। राज्य में बाघों की आबादी में सुधार जारी रहेगा या नहीं, यह न सिर्फ़ रिज़र्व के अंदर सुरक्षा पर, बल्कि उनके बीच के जंगलों के आपस में जुड़े होने पर भी निर्भर करेगा।बैनर तस्वीर: 2018 में, बांधवगढ़ टाइगर रिज़र्व की एक युवा बाघिन कैमरा ट्रैप से गायब हो गई और 2021 तक उसके होने का कोई सुराग नहीं मिला। फिर, 400 किलोमीटर दूर अचानकमार टाइगर रिज़र्व में लगे कैमरा ट्रैप में वह दिखाई दी। बाद में वन अधिकारियों ने उसका नाम ‘झुमरी’ रखा। तस्वीर: अनुभव शर्मा।

 

Manoj Mishra

Editor in Chief

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