Blog

ताड़ पत्रों में सांस ले रही भारत की प्राचीन चिकित्सा विरासत

रायपुर आधुनिक तकनीक और डिजिटल युग के बीच भारत की हजारों वर्ष पुरानी ज्ञान परंपरा आज भी ताड़ पत्रों में जीवंत है। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में संरक्षित दुर्लभ ताड़ पत्र पांडुलिपियां न केवल आयुर्वेद और नाड़ी विज्ञान की विलक्षण विरासत को संजोए हुए हैं, बल्कि भारतीय चिकित्सा परंपरा के उस अद्भुत अध्याय को भी सामने लाती हैं, जिसने सदियों तक मानव जीवन को दिशा दी। इन पांडुलिपियों की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि इनमें लिखे अक्षर सामान्य आंखों से दिखाई नहीं देते। सेमी के पत्तों के रस के प्रयोग से प्राचीन अक्षर उभरकर स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं।

‘ज्ञानभारतम राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण अभियान’ से मिल रही नई पहचान 

भारत सरकार द्वारा संचालित ‘ज्ञानभारतम राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण अभियान’ के अंतर्गत रायगढ़ जिला प्रशासन इन अमूल्य धरोहरों के संरक्षण, दस्तावेजीकरण और अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। प्रशासन की टीम जिले में विभिन्न स्थानों पर संरक्षित दुर्लभ पांडुलिपियों का सर्वेक्षण कर उन्हें संरक्षित करने में जुटी है। इसी क्रम में टीम रायगढ़ के कोतरा रोड स्थित उस स्थान तक पहुंची, जहां प्रख्यात नाड़ी वैद्याचार्य स्वर्गीय पंडित विश्वनाथ मिश्रा से जुड़ी दुर्लभ ताड़ पत्र पांडुलिपियां आज भी सुरक्षित रखी गई हैं।

राजा चक्रधर सिंह के नवरत्नों में शामिल थे पंडित विश्वनाथ मिश्रा  

स्वर्गीय पंडित विश्वनाथ मिश्रा अपने समय के प्रसिद्ध नाड़ी वैद्याचार्य थे। वे रायगढ़ रियासत के राजा चक्रधर सिंह के नवरत्नों में शामिल थे तथा राजकीय वैद्य के रूप में अपनी सेवाएं देते थे। कहा जाता है कि वे इन्हीं ताड़ पत्र पांडुलिपियों के आधार पर लोगों की नाड़ी जांच कर रोगों का उपचार करते थे।

इन्हें पढ़ने की एक विशिष्ट पारंपरिक पद्धति

इन पांडुलिपियों को आज भी उनके परिवार द्वारा अत्यंत सावधानी और श्रद्धा के साथ सुरक्षित रखा गया है। पंडित विश्वनाथ मिश्रा के सुपुत्र पीतांबर मिश्रा ने बताया कि ये पांडुलिपियां पूर्णतः आयुर्वेद और नाड़ी विज्ञान से संबंधित हैं तथा उडि़या भाषा में लिखी गई हैं। उन्होंने कहा कि इन ताड़ पत्रों पर अंकित अक्षर सामान्य रूप से दिखाई नहीं देते। इन्हें पढ़ने की एक विशिष्ट पारंपरिक पद्धति है, जिसमें ताड़ पत्रों पर सेमी के पत्ते का रस लगाया जाता है। इसके बाद सदियों पुराने अक्षर स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आते हैं। लगभग दो सौ ताड़ पत्रों को इसी विधि से तैयार किया गया है।

चिकित्सा विज्ञान, सांस्कृतिक इतिहास और पारंपरिक चिकित्सा पद्धति का जीवंत दस्तावेज

पीतांबर मिश्रा ने बताया कि उनके पूर्वजों द्वारा तैयार किया गया यह ज्ञान भंडार केवल परिवार की धरोहर नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और चिकित्सा विज्ञान की अमूल्य संपत्ति है। परिवार के सदस्य सत्येंद्र मिश्रा एवं राजेंद्र कुमार मिश्रा वर्षों से इन पांडुलिपियों को संरक्षित करने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि ताड़ पत्रों में संरक्षित यह ज्ञान भारतीय आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान, सांस्कृतिक इतिहास और पारंपरिक चिकित्सा पद्धति का जीवंत दस्तावेज है। इनका संरक्षण केवल अतीत को सहेजने का प्रयास नहीं, बल्कि आने वाली पीढि़यों को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है।

उल्लेखनीय है कि ‘ज्ञानभारतम राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण अभियान’ का उद्देश्य देशभर में बिखरी प्राचीन पांडुलिपियों की खोज, संरक्षण, डिजिटलीकरण और अध्ययन को बढ़ावा देना है। यह अभियान भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा, चिकित्सा विज्ञान, दर्शन, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

आने वाली पीढि़यों के लिए ज्ञान और इतिहास का अमूल्य खजाना भी सिद्ध होगी

रायगढ़ जिला प्रशासन द्वारा इस अभियान के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि जिले में संरक्षित दुर्लभ पांडुलिपियों को सुरक्षित रखा जा सके तथा उन्हें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल सके। प्रशासन की यह पहल न केवल भारत की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि आने वाली पीढि़यों के लिए ज्ञान और इतिहास का अमूल्य खजाना भी सिद्ध होगी।

The post ताड़ पत्रों में सांस ले रही भारत की प्राचीन चिकित्सा विरासत appeared first on ShreeKanchanpath.

Manoj Mishra

Editor in Chief

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button