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भारत में किंग कोबरा ट्रेनों में ‘सफ़र’ कर रहे हैं, आख़िर इसकी वजह क्या है?

हालांकि एक ऐसा अध्ययन सामने आया है, जिससे जंगलों में रहने वाले किंग कोबरा के संरक्षण पर सवाल खड़े हो रहे हैं.

सूरत के वैज्ञानिक और सरीसृप विशेषज्ञ दिकांश परमार ने एक अनोखा शोध किया है. उनके अध्ययन से पता चला है कि भारत में नागराज किंग कोबरा संभवतः ट्रेनों में सफ़र कर रहे हैं.

जंगलों में रहने वाले किंग कोबरा रेलवे ट्रैक या ट्रेनों तक कैसे पहुंच रहे हैं?

गोवा जाने वाली कई रेल लाइनें घने जंगलों से होकर गुजरती हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि किंग कोबरा कभी-कभी शिकार या आश्रय की तलाश में पटरियों या ट्रेनों के पास आ जाते हैं. इस तरह वे प्रकृति से दूर ऐसे इलाकों में पहुंच जाते हैं जहां उनके लिए भोजन या सुरक्षित आश्रय नहीं होता.

उनका शोध प्रतिष्ठित पत्रिका ‘बायोट्रोपिका’ में भी प्रकाशित हुआ है, जो अमेरिका की पारिस्थितिकी और उसके संरक्षण और प्रबंधन विषयों पर शोध को कवर करती है.

इस पत्रिका में प्रकाशित शोध से पता चलता है कि दुनिया का सबसे लंबा विषैला सांप, किंग कोबरा (ओफियोफैगस कालिंगा), अनजाने में लंबी दूरी की ट्रेनों में यात्रा कर रहा होगा.

वैज्ञानिकों के लिए इस   करवाना महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें शोध प्रकाशित होने की सफलता दर केवल 36 प्रतिशत है.

 अध्ययन से पता चलता है कि किंग कोबरा के क्षेत्र में हो रहे बदलाव इस सांप प्रजाति की सुरक्षा, संरक्षण और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए एक चुनौती पेश कर रहे हैं.

दिकांश परमार ने अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की एक टीम के साथ मिलकर गोवा में किंग कोबरा के 47 स्थानों का अध्ययन किया, जिनमें से अधिकांश पश्चिमी घाट के दूरस्थ जंगलों में स्थित हैं.

इसके लिए उन्होंने गोवा स्थित एनिमल रेस्क्यू स्क्वाड से भी मदद ली. यह स्क्वाड कई वर्षों से सांपों सहित जंगली जानवरों को बचाने का काम कर रहा है.

गोवा में पांच रेलवे स्टेशनों के पास मिले किंग कोबरा

 

दिकांश परमार ने गोवा के पशु बचाव दल द्वारा बचाए गए 47 स्थानों का अध्ययन किया. इनमें से 18 स्थान उत्तरी गोवा में और 29 स्थान दक्षिणी गोवा में थे.

दिकांश परमार ने अपने अध्ययन के बारे में जानकारी देते हुए बीबीसी गुजराती को बताया, “किंग कोबरा को भारत का राष्ट्रीय सरीसृप माना जाता है. इसकी प्रजाति को पूरे भारत में एक ही माना जाता था, हालांकि इसकी धारियों का पैटर्न अलग-अलग होता था, फिर भी इसे एक अलग प्रजाति नहीं माना जाता था.”

”वैज्ञानिकों को संदेह था कि इसकी अन्य प्रजातियां भी होंगी. इसलिए, उन्होंने यहां, विशेष रूप से पश्चिमी घाट में पाए जाने वाले कोबरा को ओफियोफैगस कालिंगा के रूप में मान्यता दी. यह सांप संरक्षित श्रेणी में आता है.”

कहते हैं कि ‘अगर यह सांप किसी व्यक्ति को काट ले तो वह पानी नहीं मांगता और लगभग तुरंत ही मर जाता है.’

इस अध्ययन में पाया गया कि ये सभी स्थान या तो रेलवे स्टेशन के पास थे या रेलवे लाइन के पास थे.

उन्होंने बताया, “गोवा स्थित पशु बचाव दल ने 2002 से 2024 तक कुल 120 किंग कोबरा सांपों को बचाया. जब हमने सभी स्थानों का अध्ययन किया, तो पाया कि उनमें से 47 रेलवे ट्रैक के आसपास थे. एक सांप गोवा के एक रेलवे स्टेशन की पटरियों के पास मिला था.”

Manoj Mishra

Editor in Chief

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