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कोई भी परीक्षा उतनी कठिन नहीं…’ 2 बार UPSC क्रैक कर बने IPS, डाॅक्टरी के बाद चुनी सिविल सेवा

सफलता एक दिन में नहीं मिलती लेकिन सही दिशा में मेहनत और पक्के इरादे से आगे बढ़ा जाए तो एक दिन जरूर मिलती है। कुछ ऐसी ही कहानी है डाॅक्टरी के बाद सिविल सेवा चुनने वाले अर्पित जैन (Arpit Jain) की। उन्होंने 2 बार UPSC का एग्जाम क्रैक किया।   बनने के बाद वह हमेशा अपने काम को लेकर चर्चा में रहते हैं। हाल ही में उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट पर यूपीएससी जर्नी के बारे में बात की है। इस   में परीक्षा को लेकर उन्होंने क्या कहा और उनका सफर।अर्पित जैन मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव मक्सी के रहने वाले हैं। उनका मानना है कि अनुशासन और उद्देश्य आपको कहीं भी ले जा सकते हैं। वह ऐसे घर में पले-बढ़े, जहां शिक्षा को बहुत महत्व दिया जाता था लेकिन संसाधन सीमित थे।कक्षा 8 के बाद वह रिश्तेदारों के साथ रहते हुए अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए भोपाल चले गए। यह घर से दूर जाने और अपने पैरों पर खड़े होने का उनका पहला अनुभव था। वह बदलाव एक टर्निंग प्वाइंट बन गया।

डॉ. जैन ने भारत के प्रमुख मेडिकल संस्थानों में से एक बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU), वाराणसी से   किया। इसके बाद एमडी की पढ़ाई की। डाॅक्टरी की पढ़ाई करते-करते जैन को महसूस हुआ कि जिन कई समस्याओं का वे सामना कर रहे थे, उनकी जड़ें अस्पताल से बाहर थीं। इससे उन्हें एक गहरी समझ मिली।समाज में सही मायने में सुधार के लिए अक्सर पॉलिसी और पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के लेवल पर काम करने की जरूरत होती है। इसी उद्देश्य से प्रेरित होकर जैन ने  की तैयारी की और उसे 2 बार एग्जाम पास किया। 2014 में 194 रैंक लाकर इंडियन पुलिस सर्विस (IPS) में शामिल हो गए।उन्होंने अपनी यूपीएससी जर्नी के बारे में बताया। उन्होंने उसमे लिखा कि यूपीएससी जैसी देश की सबसे चुनौतीपूर्ण परीक्षा को मैंने 2 बार सफलतापूर्वक उत्तीर्ण किया है। अनुभव ने एक सत्य स्पष्ट कर दिया है कि कोई भी परीक्षा उतनी कठिन नहीं होती, जिसका उतना भय हम अपने मन में बना लेते हैं। सही रणनीति, स्पष्ट मार्गदर्शन और निरंतर अभ्यास के साथ दुनिया की कोई परीक्षा असंभव नहीं होती- बस विश्वास और अनुशासन चाहिए।अर्पित जैन मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव मक्सी के रहने वाले हैं। उनका मानना है कि अनुशासन और उद्देश्य आपको कहीं भी ले जा सकते हैं। वह ऐसे घर में पले-बढ़े, जहां शिक्षा को बहुत महत्व दिया जाता था लेकिन संसाधन सीमित थे।

 

Manoj Mishra

Editor in Chief

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