. *वाणी जो भक्ति जगा दे*
गुरु पूर्णिमा केवल गुरुओं के सम्मान का पर्व नहीं, बल्कि उस ज्ञान-ज्योति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है जो मनुष्य के भीतर सुप्त आध्यात्मिक चेतना को जागृत कर देती है। मेरे लिए गुरुदेव भगवान परम पूज्य मलूकपीठाधीश्वर श्री राजेंद्र दास जी महाराज एक ऐसे ही संत हैं, जिनकी वाणी केवल कानों को सुनाई नहीं देती, बल्कि सीधे अंतःकरण में उतर जाती है।
मुझे अब तक उनके प्रत्यक्ष दर्शन का सौभाग्य नहीं मिला है। मैंने उन्हें केवल यूट्यूब पर सुना है, परंतु कभी-कभी शब्दों का सामीप्य भी जीवन में उतना ही गहरा परिवर्तन ला देता है जितना प्रत्यक्ष सान्निध्य। उनकी प्रत्येक कथा के बाद मन स्वतः ही अगली कथा सुनने के लिए लालायित हो उठता है। यही किसी सिद्ध संत की वाणी की सबसे बड़ी पहचान है कि वह श्रोता को बाँधती नहीं, बल्कि भीतर से रूपांतरित करना प्रारंभ कर देती है।
उनके प्रवचनों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे भक्ति को केवल शास्त्रों के उद्धरणों तक सीमित नहीं रखते। भक्तों के चरित्रों का वर्णन करते समय वे अनेक प्रसंग अपने अनुभूत अनुभवों से जोड़ते हैं, जिससे कथा केवल इतिहास नहीं रह जाती, बल्कि वर्तमान का जीवंत सत्य बन जाती है। उनकी वाणी में वैराग्य कोई पलायन नहीं, भक्ति कोई कर्मकांड नहीं और ईश्वर कोई कोरी कल्पना नहीं, बल्कि जीवन का परम लक्ष्य बनकर प्रकट होते हैं।
उन्होंने बार-बार यह प्रेरणा दी है कि “मानव जन्म केवल भगवद-प्राप्ति के लिए ही है।” यह सूत्र उनके स्वयं के जीवन में भी परिलक्षित होता है। त्याग, अनुशासन, गौसेवा, संत-परंपरा के प्रति पूर्ण समर्पण और साधना के प्रति अटूट निष्ठा उनके वचनों को विश्वसनीय बनाती है। वे केवल उपदेश नहीं देते, बल्कि अपने आचरण से उन उपदेशों को प्रमाणित भी करते हैं।
मैंने उनके श्रीमुख से ‘शिवपुराण’ और ‘भक्तमाल’ जैसी पावन कथाओं का श्रवण किया है। उनकी कथा-शैली की एक और विशेषता यह है कि वे अनावश्यक प्रसंगों या केवल मनोरंजन के लिए जोड़ी गई बातों में समय नष्ट न कर, मूल कथा के भाव को अत्यंत सरल, स्पष्ट और हृदयस्पर्शी ढंग से प्रस्तुत करते हैं। परिणामस्वरूप, मन सहज ही कथा में लीन हो जाता है और अंतःकरण में भगवद्-प्रेम की एक नई आकांक्षा जाग्रत होने लगती है।
आज के समय में, जब अध्यात्म भी कई बार बाह्य प्रदर्शन का माध्यम बनता दिखाई देता है, तब ऐसे संतों की वाणी मन को उसके मूल उद्देश्य की ओर लौटाती है। उनके प्रवचनों में अनेक गूढ़ प्रश्नों के उत्तर स्वतः मिल जाते हैं—जैसे भक्ति क्या है, वैराग्य क्या है, सच्चा भक्त कौन है और ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग क्या है?
गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर मैं अपने पूज्य गुरुदेव भगवान के चरणों में श्रद्धापूर्वक कोटि-कोटि प्रणाम निवेदित करती हूँ। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि उनकी अमृतवाणी निरंतर असंख्य जीवनों में भक्ति, सेवा और भगवद्-प्रेम का दीप प्रज्वलित करती रहे।
जिनकी कथा में भक्तों का, चरित सजीव हो उठे।
सुनते-सुनते अंतर्मन में, प्रेम-प्रदीप हो उठे।।
ऐसे गुरुवर के चरणों में, श्रद्धा का अर्पण है।
उनकी वाणी ही मेरे जीवन का मंगल-दर्पण है।।
प्रार्थना है—कृपा की वह धारा यूँ ही बहती रहे।
हर हृदय में भगवत्-प्रेम की, ज्योति सदा जलती रहे।।
ऋचा चंद्राकर “तत्वाकांक्षी”
कौन्दकेरा, महासमुंद



