मैं थोड़ी देर बाद आता हूं… से शुरू हुई हरीश राणा की कहानी अब 13 साल के संघर्ष के बाद इच्छामृत्यु के मामले तक पहुंच चुकी है। जयसिंहपुर उपमंडल के सरी मोलग क्षेत्र के प्लेटा गांव के लोग हरीश राणा के स्वस्थ होकर लौटने की उम्मीद में थे, लेकिन अब सर्वोच्च न्यायालय से इच्छामृत्यु की मंजूरी के मामले के बाद लोग भावुक हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि भले ही हरीश राणा का परिवार वर्षों पहले रोजगार के सिलसिले में प्रदेश से बाहर बस गया हो, लेकिन प्लेटा गांव से कभी नाता नहीं तोड़ा।
अशोक राणा ने कोविड से पूर्व गांव में नया मकान बनाया था और कोरोना काल में जब काम धंधे बंद थे तो यहीं परिवार के साथ समय बिताया था। कच्छाल जग्गियां गांव निवासी हरीश राणा के मामा मिलाप सिंह ने बताया कि हरीश बचपन से अपने ननिहाल से बहुत गहराई से जुड़ा हुआ था और पढ़ाई के दौरान भी लंबे समय तक उनके साथ रहा। 20 अगस्त 2013, रक्षाबंधन के दिन ममेरे भाई ने जब उसे राखी बंधवाने चलने को कहा, तो हरीश ने हंसते हुए जवाब दिया.. आप चलो, मैं थोड़ी देर बाद आऊंगा… लेकिन किसे पता था कि यह उसकी आखिरी सामान्य बातचीत होगी।
इसके बाद वह चौथी मंजिल से गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गया। सूचना मिलते ही मामा पीजीआई पहुंचे, लेकिन इसके बाद हरीश कोमा में चला गया और फिर कभी होश में नहीं आ सका। इलाज के लिए परिवार ने दिन-रात एक कर दिए, यहां तक कि दिल्ली का घर भी बेचना पड़ा और गाजियाबाद में बसना पड़ा। मिलाप सिंह बताते हैं कि घर का एक कमरा अस्पताल बन गया था, जहां हरीश वर्षों तक मशीनों के सहारे जिंदगी और मौत के बीच जूझता रहा।
पड़ोसी सुदेश कुमारी ने भावुक होते हुए बताया कि जब भी हरीश बचपन में गांव आता था, तो सभी बच्चे मिलकर खेलते थे और पूरे माहौल में रौनक सी लग जाती थी। उन्होंने कहा कि इस खबर को सुनकर वे बेहद व्यथित हैं और पुराने दिन याद कर मन भर आता है। वहीं ग्राम पंचायत सरी के उपप्रधान राजू राणा ने भी इस घटना पर गहरी संवेदना व्यक्त की है। कहा कि यह अत्यंत दुखद और संवेदनशील मामला है। उन्होंने परिवार के प्रति सहानुभूति जताते हुए कहा कि पूरा क्षेत्र इस कठिन समय में उनके साथ खड़ा है।