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न सड़न का डर, न रोगों की टेंशन! टमाटर की खेती में इस खास तकनीक से, बाराबंकी का किसान कमा रहा लाखों का मुनाफा

बाराबंकी: उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में अब किसान पारंपरिक फसलों के बजाय सब्जियों की आधुनिक खेती की ओर रुख कर रहे हैं. टमाटर की खेती (Tamatar ki Kheti) आज के समय में किसानों के लिए मुनाफे का एक बेहतरीन विकल्प बनकर उभरी है. टमाटर एक ऐसी सब्जी है जिसकी मांग बाजार में सालभर बनी रहती है, चाहे मौसम कोई भी हो. बाराबंकी के पाटमाऊ गांव के रहने वाले युवा किसान दीपक वर्मा ने इसी मांग को पहचाना और आज वे टमाटर की उन्नत खेती से एक ही फसल पर लाखों रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं.

खास तकनीक करते है टमाटर की खेती
दीपक वर्मा बताते हैं कि उनके पिता काफी सालों से साग-सब्जियों की खेती करते आ रहे थे. उन्हीं से प्रेरणा लेकर दीपक ने भी इस काम को आगे बढ़ाया, लेकिन उन्होंने इसमें आधुनिक तकनीक को शामिल किया. आज दीपक करीब आधे एकड़ खेत में टमाटर की खेती कर रहे हैं. उन्होंने ‘साहू’ किस्म के टमाटर को चुना है, जो अपनी अधिक पैदावार और बड़े फल के लिए जाना जाता है. दीपक के अनुसार, इस किस्म का स्वाद बेहतरीन होता है, जिसकी वजह से बाजार में इसकी कीमत अन्य किस्मों के मुकाबले काफी अच्छी मिलती है.

कम लागत में बंपर मुनाफा देती है टमाटर की खेती
मुनाफे के बारे में समझाते हुए दीपक बताते हैं कि टमाटर की खेती में उनकी लागत लगभग 25 से 30 हजार रुपये आई. वहीं, पैदावार इतनी अच्छी होती है कि एक सीजन में 90 हजार से 1 लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा आसानी से हो जाता है. आधे एकड़ में लगी यह फसल दीपक के लिए किसी जैकपॉट से कम नहीं है. इस किस्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसका फल मजबूत होता है, जिससे इसे दूर की मंडियों में भेजने में भी परेशानी नहीं होती

मल्चिंग और बांस-डोरी विधि से टमाटर की खेती
दीपक अपनी फसल को रोगों से बचाने के लिए ‘मल्चिंग’ का इस्तेमाल करते हैं. इस विधि में खेत में मेड़ बनाकर उस पर प्लास्टिक की पन्नी बिछाई जाती है, जिससे पौधों में सड़न और मिट्टी से लगने वाले रोग बहुत कम हो जाते हैं. इसके साथ ही वे पौधों को सीधा रखने के लिए बांस और डोरी का सहारा देते हैं. इस तकनीक से टमाटर जमीन को नहीं छूते, जिससे फल साफ सुथरा रहता है और कीटों का हमला भी कम होता है.

कैसे होती है इसकी खेती?
टमाटर की खेती की प्रक्रिया काफी सरल है. सबसे पहले नर्सरी तैयार की जाती है. जब पौधे तैयार हो जाते हैं, तो खेत की दो-तीन बार गहरी जुताई कर मेड़ बनाई जाती है. मल्चिंग पन्नी में छेद करके निश्चित दूरी पर पौधे लगाए जाते हैं. दीपक बताते हैं कि पौधा लगाने के महज दो महीने (60 दिन) बाद ही टमाटर निकलना शुरू हो जाते हैं. एक बार फसल शुरू होने के बाद अगले तीन से चार महीने तक लगातार टमाटर की तुड़ाई चलती रहती है, जिससे किसान को रोजाना आय प्राप्त होती है.

 

Manoj Mishra

Editor in Chief

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