बल्हा स्थित कृषि विज्ञान केंद्र सीतामढ़ी में फलों और सब्जियों के मूल्यवर्धन पर आधारित तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का समापन हुआ। कार्यक्रम में जिले के अलग-अलग प्रखंडों से 25 युवा और युवतियों ने भाग लिया। केंद्र के वरीय वैज्ञानिक और प्रधान डॉ. राम ईश्वर प्रसाद ने कहा कि जब सब्जियों और फलों की कीमत बहुत कम हो जाती है, तब मूल्यवर्धन से आमदनी कई गुना बढ़ाई जा सकती है। इससे उत्पाद को लंबे समय तक रखा भी जा सकता है। फसल के तुरंत बाद होने वाले नुकसान को रोकने और बाजार में उत्पादों की बेहतर कीमत पाने के लिए मूल्यवर्धन बेहद महत्वपूर्ण है। बताया कि भारत में लगभग 30-40% फल और सब्जियां तुड़ाई-उपरांत खराब हो जाती हैं। प्रसंस्कृत उत्पाद बनाकर इस क्षति को रोका जा सकता है। इससे बेहतर मुनाफा होगा। कच्चे फल-सब्जियों को बेचने की तुलना में उनसे बने प्रसंस्कृत उत्पादों का बाजार भाव काफी अधिक होता है, जिससे किसानों की आय 15% से 40% तक बढ़ सकती है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रसंस्करण इकाइयां लगाने से स्थानीय स्तर पर युवाओं और महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं। मूल्यवर्धन के माध्यम से कच्चे उत्पादों को विभिन्न रूपों में बदलकर उनकी शेल्फ-लाइफ को काफी लंबा किया जा सकता है। वहीं गृह वैज्ञानिक डॉ. सलोनी चौहान ने सेब, चुकंदर और आम से जैम, जैली, कैडी और आरटीएस पेय पदार्थ बनाने की वैज्ञानिक विधि बताई। उन्होंने सैद्धांतिक और प्रायोगिक तरीके से प्रशिक्षण दिया। डॉ. चौहान ने फलों और सब्जियों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की तकनीक, प्रिजर्वेटिव का संतुलित उपयोग, बोतलों का स्टरलाइजेशन, स्वच्छता पर भी जानकारी दी। प्रशिक्षण प्रभारी डॉ. किंकर कुमार और उद्यान वैज्ञानिक मनोहर पंजीकार ने बताया कि आकर्षक पैकेजिंग, लेबलिंग, एफएसएसएआई से लाइसेंस मिलने पर विपणन आसान हो जाता है। युवाओं और युवतियों का समूह बनाकर विपणन करने पर बेहतर परिणाम आ सकता है। सस्य वैज्ञानिक सच्चिदानंद प्रसाद और पादप रक्षा वैज्ञानिक डॉ. श्रीति मोसेस ने कहा कि सरकार मूल्यवर्धन और स्वयं सहायता समूह को बढ़ावा देने के लिए कई कार्यक्रम नियमित रूप से चला रही है।
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