हौसलों की उड़ान सच्ची हो तो आसमान भी छोटा पड़ जाता है. मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले के चंदेरी जैसे छोटे कस्बे से निकलकर सरकारी अफसर बनना साधारण बात नहीं है. लेकिन विवेक यादव ने यह कर दिखाया. उनकी सफलता उन लाखों युवाओं के लिए मिसाल है, जो रिसोर्सेस के अभाव और लगातार मिल रही असफलताओं के आगे घुटने टेक देते हैं. विवेक ने साबित कर दिया कि हार को ही अपनी सबसे बड़ी सीख बनाकर इतिहास रचा जा सकता है.विवेक यादव रातों-रात सफल नहीं हुए. इसके पीछे 17 अलग-अलग प्रतियोगी परीक्षाओं में मिली करारी हार का कड़वा अनुभव छिपा है. उनके पिता नवलसिंह यादव चंदेरी नगर पालिका में ड्राइवर के रूप में कार्यरत हैं और मां आंगनवाड़ी सहायिका होने के साथ-साथ घर पर सिलाई कर परिवार का हाथ बंटाती हैं. आर्थिक तंगी के बावजूद माता-पिता ने विवेक के सपनों की उड़ान में कभी बाधा नहीं आने दी. विवेक यादव ने यूपीएससी 2025 में 487वीं रैंक हासिल की है. पढ़िए उनकी
इन परीक्षाओं में हुए असफल
विवेक यादव ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर अपनी डायरी का एक पेज शेयर किया है. उसमें सभी असफलताओं का जिक्र है.
- नवोदय विद्यालय प्रवेश परीक्षा (2010)
- एनडीए (2016)
- यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा (लगातार तीन प्रयास – 2021, 2022 और 2023)
- एमपीपीएससी (2021 और 2022)
- यूपीपीएससी (2022 और 2023 के इंटरव्यू में असफलता)
- यूपीएससी सीएपीएफ (2022 और 2024)
- पटवारी परीक्षा (2023)
- केवीएस क्लर्क
- एसएससी दिल्ली पुलिस कांस्टेबल
- जेआरएफ
- एमपीपीएससी (2024 और 2025).
पिता ड्राइवर और मां सिलाई कर बुने बेटे के सपने
विवेक की सफलता की नींव उनके माता-पिता के परिश्रम पर टिकी है. एनबीटी की रिपोर्ट के अनुसार, उनके पिता नवलसिंह यादव चंदेरी नगर पालिका में सीएमओ के ड्राइवर हैं और वर्तमान में अनियमित कर्मचारी के रूप में सेवाएं दे रहे हैं. घर की आर्थिक स्थिति संभालने के लिए उनकी मां न केवल आंगनवाड़ी केंद्र में सहायिका हैं, बल्कि घर पर सिलाई का काम भी करती हैं. बेहद सीमित आय के बावजूद उन्होंने विवेक की पढ़ाई में कोई कटौती नहीं की और उन्हें दिल्ली जैसे शहर में रहकर तैयारी करने का पूरा मौका दिया.
ट्रेनिंग के साथ जारी रखी जिद
रेलवे में असिस्टेंट कमिश्नर के पद पर चयन होने के बाद विवेक लखनऊ में अपनी ट्रेनिंग कर रहे थे. लेकिन उनका लक्ष्य तो खाकी वर्दी पहनकर देश की सेवा करना था. ट्रेनिंग के व्यस्त शेड्यूल के बीच भी उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और यूपीएससी 2025 की परीक्षा दी. इस बार उनकी मेहनत रंग लाई और 487वीं रैंक के साथ उन्होंने अपना आईपीएस बनने का सपना पूरा कर लिया. यह उनका पांचवां प्रयास था, जिसमें उन्होंने इतिहास रचा.
सरस्वती विद्या मंदिर से हिंदू कॉलेज तक का सफर
विवेक यादव की शुरुआती शिक्षा चंदेरी के सरस्वती विद्या मंदिर से हुई. स्कूली पढ़ाई के बाद वे दिल्ली आ गए और प्रतिष्ठित हिंदू कॉलेज (DU) से हिस्ट्री ऑनर्स में ग्रेजुएशन किया. इसके बाद उन्होंने इग्नू (IGNOU) से इतिहास में ही पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री ली. पिछले तीन सालों से वे पूरी तरह से सिविल सर्विस की तैयारी में जुटे थे. उनकी शैक्षणिक यात्रा साबित करती है कि छोटे शहर का छात्र भी अगर सही दिशा में मेहनत करे तो वह देश के बेहतरीन संस्थानों और पदों तक पहुंच सकता है.विवेक यादव की कहानी साबित करती है कि असफलताएं केवल पड़ाव हैं, अंत नहीं. अगर आप अपनी गलतियों से सीखने को तैयार हैं तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको सफल होने से नहीं रोक सकती.





