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भरण-पोषण नहीं देने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, पति के वेतन से हर महीने 25 हजार काटकर पत्नी के खाते में भेजने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में सख्त रुख अपनाते हुए पति के नियोक्ता को निर्देश दिया कि वह उसके वेतन से हर महीने 25 हजार रुपये काटकर सीधे उसकी अलग रह रही पत्नी के बैंक खाते में जमा करे। यह राशि पत्नी और उनकी नाबालिग बेटी के भरण-पोषण के लिए दी जाएगी।

जस्टिस जे.बी.पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने यह आदेश तब दिया, जब पाया कि पति पहले दिए गए अदालत के आदेशों का पालन नहीं कर रहा था और 2022 से अलग रहने के बावजूद उसने पत्नी और बच्ची के लिए कोई भरण-पोषण राशि नहीं दी।

अदालत ने कहा कि दंपति की चार साल की एक बेटी है, जिसकी देखभाल पूरी तरह मां कर रही है। खंडपीठ ने यह भी दर्ज किया कि पिछले चार वर्षों में पति ने न तो बच्ची के पालन-पोषण में कोई योगदान दिया और न ही उससे मिलने का प्रयास किया।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को मध्यस्थता के लिए भेजा था और विवाह समाप्त करने के लिए एकमुश्त समझौते की संभावना तलाशने को कहा था। अंतरिम व्यवस्था के रूप में पति को पत्नी और बच्ची के मध्यस्थता में आने-जाने के खर्च के लिए 25 हजार रुपये जमा करने का निर्देश दिया गया, लेकिन अदालत ने पाया कि उसने उस आदेश का भी पालन नहीं किया।

सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि 2024 में मजिस्ट्रेट अदालत ने अंतरिम भरण-पोषण का आदेश पारित किया लेकिन पति ने उसका भी पालन नहीं किया और लगभग 1.38 लाख रुपये की बकाया राशि जमा हो गई।

सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने पति द्वारा दाखिल आर्थिक स्थिति के हलफनामे की भी जांच की। उसमें उसने दावा किया कि उसकी मासिक आय 50 हजार रुपये है और वह आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहा है।

अदालत ने उससे पूछा कि क्या वह बकाया सहित 2.5 लाख रुपये जमा करने को तैयार है, लेकिन उसने भुगतान करने से इनकार कर दिया।

इसके बाद पीठ ने आदेश देते हुए कहा,

“इन परिस्थितियों में हमारे पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचता। इसलिए प्रतिवादी पति के नियोक्ता को निर्देश दिया जाता है कि उसके वेतन से हर महीने 25 हजार रुपये काटे जाएं और यह राशि आरटीजीएस के माध्यम से सीधे पत्नी के खाते में भेजी जाए।”

सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से नाबालिग बच्ची के हितों को लेकर चिंता व्यक्त की। अदालत ने नोट किया कि बच्ची की परवरिश मां अकेले कर रही है और पिता के निधन के बाद वह फिलहाल अपने चाचा के घर रह रही है।

अदालत ने इस मामले को आदेश के अनुपालन की जानकारी के लिए अप्रैल में अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया।

Manoj Mishra

Editor in Chief

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