छत्तीसगढ़

किसानों को दी गई उन्नत खेती की जानकारी*

*आदर्श दलहन ग्राम योजना के तहत कोसमंदा में प्रक्षेत्र दिवस का किया गया आयोजन*

*किसानों को दी गई उन्नत खेती की जानकारी*

कवर्धा, मार्च 2026। कृषि विज्ञान केन्द्र कवर्धा द्वारा आदर्श दलहन ग्राम योजनांतर्गत ग्राम कोसमंदा में 11 मार्च को प्रक्षेत्र दिवस का आयोजन किया गया। इस अवसर पर मसूर की उन्नत किस्म कोटा मसूर-4 का समूह प्रदर्शन किया गया तथा कृषकों को उन्नत बीज का वितरण किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों की आय में वृद्धि करना तथा देश में दलहन उत्पादन को बढ़ावा देना है। कृषि विज्ञान केन्द्र, कवर्धा द्वारा मॉडल पल्स विलेज कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है, जिसके अंतर्गत चयनित गांवों को दलहन उत्पादन के लिए मॉडल गांव के रूप में विकसित किया जा रहा है, ताकि उन्नत तकनीकों को अपनाकर अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सके तथा अन्य किसान भी प्रेरित हों।
कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केन्द्र, कवर्धा के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. बी.पी. त्रिपाठी ने किसानों को चना, अरहर, मूंग, उड़द एवं मसूर जैसी दलहनी फसलों की आधुनिक खेती की तकनीकों के बारे में प्रशिक्षण दिया। उन्होंने उन्नत बीज, बीज उपचार, संतुलित उर्वरक उपयोग, कीट एवं रोग नियंत्रण तथा सिंचाई प्रबंधन की विस्तृत जानकारी दी। विषय वस्तु विशेषज्ञ डॉ. बी.एस. परिहार ने बताया कि दलहन फसलें किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ मृदा की उर्वरता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, क्योंकि दलहनी पौधे मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करते हैं, जिससे रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम होती है और खेती अधिक टिकाऊ बनती है। उन्होंने बताया कि योजना के अंतर्गत किसानों को प्रदर्शन प्लॉट भी दिए जाते हैं, जहां उन्नत तकनीकों का प्रयोग कर बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जाता है।
कार्यक्रम के प्रभारी वैज्ञानिक इंजी. टी.एस. सोनवानी ने बताया कि मॉडल पल्स विलेज कार्यक्रम का मुख्य लक्ष्य देश में दलहन उत्पादन बढ़ाना, आयात पर निर्भरता कम करना तथा किसानों की आय में वृद्धि करना है। इस योजना के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। विषय वस्तु विशेषज्ञ (उद्यानिकी) डॉ. एन.सी. बंजारा ने प्राकृतिक खेती के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि प्राकृतिक खेती में रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का उपयोग नहीं किया जाता, बल्कि गोबर, गोमूत्र, जीवामृत, बीजामृत एवं अन्य जैविक पदार्थों का उपयोग किया जाता है। दलहन फसलें प्राकृतिक खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं। कार्यक्रम में सैकड़ो कृषकों ने भाग लिया।

Manoj Mishra

Editor in Chief

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